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अध्याय : दसवां ]
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अर्थात यदि कोई धनहीन हो और व्रतों के उद्यापन की विधि न करे उसे उपवास आदि संपूर्ण विधान प्रयत्नपूर्वक दूने करना चाहिये । ऐसा शास्त्रों में लिखा है सो देख लेना । यदि जिन प्रतिष्ठापूर्वक उद्यापन करने की शक्ति न हो तो उन व्रतों से अरुचि नहीं करनी चाहिये । अपनी शक्ति के अनुसार तप को बढ़ाने के लिये अपने अनेक प्रतों को विधिपूर्वक दूने कर लेना चाहिये । इन व्रतों का अलग-अलग फल बतकथा कोष आदि अनेक शास्त्रों में लिखा है, वहां से जान लेना चाहिये । तप के भेदों में अनेक व्रत हैं, सो कर्मों की निर्जरा के लिये हैं। इसलिये इनसे अरुचि नहीं करना चाहिये । सो ही मोक्षशास्त्र में लिखा है---
"तपसा निर्जरा च" अध्याय ६ सत्र सं. ३ अर्थात् तप से संबर भी होता है, कर्मों की निर्जरा भी होती है । प्रश्न :-ऊपर लिखे हुए व्रतों में से कोई मनुष्य कुछ प्रत ले लेवे और कुछ
दिन तक उनका पालन करे फिर अशुभ कर्म के उदय से किसी कारण को पाकर व्रत गल जाय, छूट जाय तो उसका क्या प्राय
श्चित है और दुबारा उसको पालन करने की विधि क्या है ? उसर-- जो कोई अती पुरुष विधि पूर्वक व्रत को लेवे और फिर रोग, शोक बा अन्य किसी कारण से व्रत की मर्यादा में एक दो आदि कुछ उपवास बाकी रह जाय तथा ऐसी हालत में वह ब्रत छुट जाय, भ्रष्ट हो जाय तो फिर उसी प्रती को चाहिये कि यह फिर प्रारम्भ से उस व्रत को करे अर्थात् उस व्रत के लिये जो पहले व्रत उपवास किये थे, वे सब व्रत भंग के पाप की निवृत्ति के लिये प्रायश्चित में चले गये, अब फिर उसे प्रारम्भ से ही व्रत धारण करना चाहिये । ऐसा अनुक्रम है, सो ही वसुनन्दी श्रावकाचार में लिखा है--
जद अन्तरम्मिकारणवसेस एको व दोब अवधासो । रण क उत्तो मूलामो पुरषो वि सा होइ कायवो ॥१९२६॥ इसकी टीका इस प्रकार है -- यद्यन्तर काले कारणवशेन कोऽपि वा द्वयोपवासाः । न कृताः हिमूलात् पुनरपि सा विधिभवति तत्कर्तध्या ।। अर्थात् यदि बीच में किसी कारण से एक वा दो उपवास न किये हों तो
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