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________________ ६१४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रकार के एकेंद्रिय जीव मनुष्यगति की आयु का बन्ध नहीं कर सकते। ऐसा श्री गोम्मट्टसार के कर्मकांडाधिकार में लिखा है सुरगिरथा परतिरिथं छम्मासवसिद्धिगे सगाउस्स । परतिरया सम्याउ' तिभागसेसम्म उक्करसं ।।१६२५॥ मावा म्बन्धन्ति । इमिला सरतिरयं तेजदुगा सत्तगा तिरियं ॥१६२६ ॥ षोडशकारण, दशलक्षशिक, रत्नत्रय तथा पंचमी आदि अनेक प्रकार के व्रत जैनशास्त्रों में बतलाये हैं तथा उन व्रतों को विधिपूर्वक पूर्ण कर लेने पर प्रतिष्ठा पूर्वक उद्यापन करने की आज्ञा व्रतकथा कोष श्रादि अनेक शास्त्रों में बतलाई है । परन्तु यदि किसी पुरुष से उसके उद्यापन की विधि प्रतिष्ठा पूर्वक न बन सके लो उसके अभाव में शांतिक कार्य करना चाहिये । अर्थात् शांतिचक्र का पाठ कर अभिषेक पूर्वक उस व्रत के उद्यापन की विधि करनी चाहिये - ऐसा मार्ग है। यही बात श्रनन्तव्रत की उद्यापन विधि में अनन्तव्रत की कथा में आचार्य पद्मनन्दी ने लिखी है श्रभावे तु प्रतिष्ठायाः शांतिकं कार्यमंजसा । तथा जिस पुरुष की इतनी भी शक्ति न हो अर्थात् वह न तो शांतिक कर्म कर सके और न उद्यापन की विधि ही कर सके, तो उसे अपने व्रत विधिपूर्वक दूने समय तक करना चाहिये। जैसे सोलह कारण सोलह वर्ष तक किये जाते हैं सो उसे बत्तीस वर्ष तक करना चाहिये । पीछे अपनी शक्ति के अनुसार पूजनादिक विधान कर व्रतों का विसर्जन करे । सो ही अनन्त व्रत की कथा में लिखा है प्रभावे तु प्रतिष्ठाया: शांतिकं कार्यमंजसा । सस्याभावे कर्तव्यं द्विगुणं तद्विधानकम् ।।१६२७॥ यही बात श्री वसुनन्दी सिद्धांत चक्रवर्ती विरचित श्रावकाचार में कायक्लेशाधिकार में लिखी है उज्जवर विहिरतरह काउजड़ कोवि अत्यपरिहोगी । तो far कार्यव्त्रा उववासविहारा पयते ॥१६२८ इसकी टीका में लिखा है उद्यापन विधि न समर्थः कर्तु यदि कोपि अर्थ हीनः । तहि द्विगुणं कर्तव्यं उपवासादि विधान प्रयत्नेन ||
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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