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अध्याय : दसवां ]
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तर्क संगत व्यवहार दृष्टि का निरादर कर विषयासक्ति पूर्ण स्वार्थी जीवन व्यतीत कर अपने को महान अध्यात्मवादी मानना अविवेकी का कार्य है । परोपकारी बनना गृहस्थ जीवन के लिये आवश्यक है। तपोवनवासी श्रेष्ठ श्रमणों की अपेक्षा स्वोपकार की दृष्टि को मुख्य माना गया है ।
तत्त्वग्राही निश्चय दृष्टि कहती है एक ही-खदान से निकले एक संगमरमर को चट्टान का एक अंश मूर्ति बनकर भगवान शांतिनाथ कहा जाता है और उस पाषाण का दूसरा अंश मन्दिर की सीढ़ी माना जाता है । यह भेद हमें मान्य नहीं है। हमारी निश्चय दृष्टि में दोनों पाषाण समान है।
इस दृष्टि को एकान्त सत्य समन्वितः स्वीकार करने पर गड़बड़ी हो जायगी । व्यवहारनय से प्रकाश प्राप्त स्याद्वादी कहेगा, खदान में उस पाषाण में भेद नहीं था, किन्तु जब मूर्तिकार ने पाषाण को तीर्थकर की मूर्ति का प्राकार दिया, प्रतिष्ठा विधि द्वारा उसकी प्राण-प्रतिष्ठा हो गई, लब साधक की विवेक पूर्ण दृष्टि . उस मूर्ति को भगवान मानकर विनय करने को प्रेरित करती है । उस दृष्टि से सीढ़ी के पार से उसी समानता का पक्ष अब उपयोगी नहीं रहेगा । अकेला अध्यात्मवाद चक्कर में डाल देगा, भगवान गोम्मटेश्वर की मूर्ति को वह पाषाण की मूर्ति मानेगा, भगवान बाहुबली की नहीं । ऐसा मानने से जीवन शोधन हेतु कुछ भी तत्त्व हाथ न लगेगा। व्यवहार दृष्टि से बाहुबली साक्षात् मूर्तिमान हैं, ऐसा मानकर आराधना करने से स्वहित संपादन होगा, अतः समन्वय पथ श्रेयस्कर एवं शांति प्रदाता है । शंका :-- स्याद्वाव पक्ष वाला निश्चय तथा व्यवहार दृष्टियों को उपयोगी,
उपकारी, हितकारी तथा श्रेयोपथ मानता है। वह एकान्त से अध्यात्म पक्ष मानने वाले को क्यों विरोध करता है ? ऐसा
करना क्या सस्य तत्व का विरोध नहीं है ? ... . समाधान :- एकान्त पक्ष वाला जब सत्य का विकृत, विकारी, हानिकारी रूप उपस्थित करता है, तब सत्यवाही दृष्टि वाले का आवश्यक कर्तव्य हो जाता है कि सत्य पक्ष के रक्षण हेतु एकान्त दृष्टि से होने वाली हानि पर प्रकाश डाले । जैनागम जब बौद्ध तत्वज्ञानी को एकान्त क्षणिक पक्ष का पोषण करते हुए पाता है, तब उसका कर्तव्य हो जाता है कि वह पददलित किये जाने वाले नित्य पक्ष को
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