SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1082
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६६२ } [ गो. प्र. चिन्तामरिण बनाता हुआ मोक्ष पथ में प्रगति करता है । प्राचार्य कुन्द-कुन्द मे भाव पाहुड में कहा . जिरणवर घरपंच रूह एमति जे परम भत्ति-राए । से जम्मवेलि मूलं खरणंति पर भाव संस्थेष ॥२११८॥ जिनेश्वर के चरण कमलों को जो उच्च भक्ति युक्त अनुराग भाव से प्रणाम करते हैं, वे जन्म रूप बेलि के मूल को निर्मल परिणाम रूप शस्त्र से काट डालते हैं। देव, गुरु, तीर्थ प्रादि का सम्पर्क पाकर मोही मानव मानसिक मलिनता से छूटता है तथा ऐसे विशिष्ट प्रानंद को प्राप्त करता है, जो भोग जन्य सुखों की अपेक्षा अत्यन्त उच्च कोटि का होता है । वीतराग की हृदय से भक्ति जनित प्रानन्द लोकोत्तर होता है। मोक्ष पुरुषार्थ सिद्धि के लिये आत्मा को अपनी शक्ति का अपव्यय रोककर स्वयं में केन्द्रित होना आवश्यक है। इससे परोपकार में समय व्यतीत करने वाले श्रमरा को इष्टोपदेश में आचार्य कहते हैं--- परोपकृति मुत्सृज्य स्वोपकार परोभव । . . ... उपकुर्वन्परस्याशः दृश्यमानस्य लोकवत् ॥२११६॥ प्रात्मन् ! अन्य का उपकार रूप कार्य त्याग करके प्रात्मा के उपकार कार्य में तत्पर हो । आत्मा से भिन्न शरीर आदि दृश्यमान वस्तुओं का हित संपादन कार्य में अपना काल व्यतीत करते हुए तुम अज्ञानी जगत का अनुकरण करते हो। __इस कथन की ओट में कोई करुणामयी प्रवृत्तियों से विमुख होकर तथा संकीर्ण दुष्टि को अपनायें, उसे आचार्य कहते हैं, प्रारम्भ में तुम्हारा जीवन अपने से हीन स्थिति में पड़े हुए व्यक्तियों को ऊंचे उठाने में व्यतीत होना चाहिये । असमर्थ की सेवा सत्कर्म है। विवेकशील गृहस्थ के लिए दान देकर परोपकाररत रहना प्राश्यक है । व्यवहार दृष्टि के प्रकाश में वे ही प्राचार्य पूज्यपाद कहते हैं ज्ञानवान् शानदानेन निर्भयोऽभयदानतः । अन्नदानात्मुखी नित्यं निर्व्याधि भैषजाद्भवेत् ॥२१२०॥ यह जीव दूसरों को ज्ञान दान करने से ज्ञानवान्, अभय दान देने से . अभय पूर्ण स्थिति युक्त होता है, अन्न दान से सदा सुखी रहता है तथा औषधि का दम करने से व्याधिरहित होता है। अतः सदा दान देना उचित हैं। इस
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy