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अध्याय : आठवां }
[ ५४३ निगोद जीव के शरीर में अनन्तानन्त सूक्ष्म जीव रहते हैं । बादर जीवों से भी सूक्ष्म जीवों का प्रतिघात नहीं होता है । असंख्यात प्रदेशी जीव लोक के प्रसंख्यातवें भाग में---
प्रदेश संहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ।।१२५३।।
दीपक के प्रकाश की तरह जीव प्रदेशों के संकोच और विस्तार की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें आदि भागों में रहता है। दीपक को यदि खुले मैदान में रक्खा जाये तो उसका प्रकाश दूर तक होगा । उसी दीपक को कोठे में रखने से कम प्रकाश और घड़े में रखने से और भी कम प्रकाश होगा। इसी प्रकार जीव भी अनादि कार्मरण शरीर के कारण छोटा और बड़ा शरीर धारण करता है और जीव के प्रदेश संकोच और विस्तार के द्वारा शरीर प्रमाण हो जाते हैं। लघु शरीर में प्रदेशों का संकोच और बड़े शरीर में प्रदेशों का विस्तार हो जाता है, लेकिन जीव वही होता है, जैसे जो हाथी और वही चींटी के शरीर में ।
एक प्रदेश में स्थित होने के कारण यद्यपि धर्म आदि द्रव्य परस्पर में प्रवेश करते हैं, लेकिन अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते, इसलिए उनमें संकर या एकत्व दोष नहीं हो सकता । पञ्चास्तिकाय में कहा भी है. कि---"ये द्रध्य परस्पर में प्रवेश करते हैं, एक दुसरे में मिलते हैं, परस्पर को अवकाश देते हैं, लेकिन अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते।" धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार
गति स्थित्युपग्रही धर्माधर्मयोरूपकारः ॥१२५४॥
एक देश से देशान्तर में जाना गति है, ठहरना स्थिति है । जीव और पुद्गलों को गमन करने में सहायता देना धर्म द्रव्य का उपकार और जीव तथा पुद्गलों को ठहरने में सहायता देना अधर्म द्रव्य का उपकार है । यद्यपि उपकार दो हैं, लेकिन उपकार शब्द सामान्य वाची होने से सूत्र में एक वचन का ही प्रयोग किया है।
प्रश्न :-सूत्र में उपग्रह शब्द व्यर्थ है, क्योंकि उपकार शब्द से ही प्रयोजन
सिद्ध हो जाता है, इसलिए पतिस्थितिधर्माधर्म योरूपकार'
ऐसा सूत्र होना चाहिये ? । उत्तर :-~-यदि सूत्र में उपग्रह शब्द न हो, तो जिस प्रकार धर्म द्रव्य का
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