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________________ :૪૪ [ गो. प्र. चिन्तामणि उपकार गति और धर्म द्रव्य का उपकार स्थिति है, ऐसा क्रम से होता है, उसी प्रकार जीवों के गमन में सहायता करना धर्म द्रव्य का उपकार और पुद्गलों को ठहरने में सहायता देना अधर्म द्रव्य का उपकार है - ऐसा विपरीत अर्थ भी हो जाता । श्रतः इस भ्रम को दूर करने के लिए सूत्र में उपग्रह शब्द का होना आवश्यक है । प्रश्न :--- धर्म और प्रधर्म द्रव्य का जो उपकार बतलाया है, यह श्राकाश का ही उपकार है, क्योंकि आकाश में हो गति और स्थिति होती है ? उत्तर :--- ग्राकाश द्रव्य को उपकार द्रव्यों को अवकाश देना है | इसलिए aft और स्थिति को प्रकाश का उपकार मानना ठीक नहीं है। एक द्रव्य के अनेक प्रयोजन मानकर, यदि धर्म और अधर्म द्रव्य का अस्तित्व स्वीकार न किया जाए, तो लोक और आलोक का विभाग नहीं हो सकेगा । इन्हीं दो द्रव्यों के कारण ही यह विभाग बनता है । प्रश्न :--- --धर्म और अधर्म द्रव्य का प्रयोजन पृथ्वी, जल प्रादि से ही सिद्ध हो जाता है, इसलिये इनके मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ? उत्तर : -- पृथ्वी, जल आदि गति और स्थिति के विशेष कारण हैं । लेकिन इनका कोई साधारण कारण भी होना चाहिये। इसलिये धर्म और अधर्म द्रव्य का मानना आवश्यक है, क्योंकि ये गति और स्थिति में सामान्य कारण होते हैं । धर्म और अधर्म द्रव्य गति और स्थिति में प्रेरक नहीं होते, किन्तु सहायक मात्र होते हैं, अतः ये परस्पर गति और स्थिति का प्रतिबन्ध नहीं कर सकते । प्रश्न :- धर्म और अर्धम द्रव्य की सत्ता नहीं है, क्योंकि इनकी उपलब्धि नहीं होती है ? उत्तर :- ऐसा कोई नियम नहीं है कि जिस वस्तु को प्रत्यक्ष से उपलब्धि हो वही वस्तु सत् मानी जाय । सब मतावलम्बी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के पदार्थों को मानते हैं । धर्म धर्म द्रव्य अतीन्द्रिय होने से यद्यपि हम लोगों को प्रत्यक्ष नहीं होते हैं, लेकिन सर्वज्ञ तो इनको प्रत्यक्ष करते ही हैं। श्रुतज्ञान से भी धर्म अधर्म द्रव्य की उपलब्धि होती है । श्राकाश का उपकार किस प्रकार है श्राकाशस्थावगाहः ।।१२५५।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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