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अध्याय : पाठवां ]
[ ५४५ समस्त द्रव्यों को अवकाश देना,आकाश का उपकार है। .. प्रश्न :-क्रिया वाले जीव और पुदगलों को प्राकाश देना तो ठीक है, लेकिन
निष्क्रिय धर्मादि बच्चों को अवकाश देना तो संभव नहीं है? उत्तर :- यद्यपि धर्म आदि में अवगाहन क्रिया नहीं होती है, लेकिन उपचार से वे भी अवगाही कहे जाते हैं। धर्म आदि द्रव्य लोकाकाश में सर्वत्र व्याप्त हैं, इसलिये व्यवहार नय से इनका अवकाश मानना उचित ही है । प्रश्न :---यदि आकाश में अवकाश देने की शक्ति है, तो दीवाल में गाय
प्रादि का और बच्न में पत्थर आदि का भी प्रवेश हो जाना
चाहिये? उत्तर :- स्थूल होने के कारण उक्त पदार्थ परस्पर का प्रतिघात करते हैं । यह अाकाश का दोष नहीं है, किन्तु उन्हीं पदार्थों का है। सूक्ष्म पदार्थ परस्पर में अवकाश देते हैं, इसलिये प्रतिधात नहीं होता। इससे यह भी नही समझना चाहिये कि अवकाश देना पदार्थों का काम है, आकाश का नहीं, क्योंकि सब पदार्थों को अवकाश देने वाला एक साधारणकारण आकाश मानना आवश्यक है । .
यद्यपि पालोकाकाश में अन्य द्रव्य न होने से आकाश का अवकाशदान लक्षण वहां नहीं बनता, लेकिन अवकाश देने का स्वभाव वहां भी रहता है, इसलिये अलोकाकाश अवकाश न देने पर भी प्रकाश ही है । पुदगल तथ्य का उपकार.. शरीरवाङ्मनः प्राणापानाः पुद्गलानाम् ।।१२५६॥ . .
शरीर, बचन, मन और श्वासोच्छवास ये पुद्गल द्रव्य के उपकार हैं।
शरीर विशीर्ण होने वाले होते हैं, औदारिक, वैक्रियिक, प्राहारक, संजस और कामगा ये पांच शरीर पुद्गल से बनते हैं । प्रात्मा के परिणामों के निमित्त से पुद्गल परमाणु कर्मरूप परिमात हो जाते हैं और कर्मों से औदारिक प्रादि शरीरों की उत्पत्ति होती है, इसलिये शरीर पोद्गलिक हैं। ... .. प्रश्न :-~-कार्मण शरोर अनाहारक होने से पौगलिक नहीं हो सकता?
उत्तर :- यद्यपि कार्मण शरीर अनाहारक है, लेकिन उसका विपाक गड कांटा आदि मूर्तिमान द्रव्य के सम्बन्ध होने पर होता है इसलिये कार्मण शरीर भी पौद्गलिक ही है।
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