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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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__वचन के दो भेद हैं-द्रव्य वचन और भाव वचन ३. वीर्यान्तराय, मति और श्रुत ज्ञानावरगद का क्षयोपशम होने पर और अंगोपांग नाम कर्म के उदय होने पर भाब बचन होते हैं, इसलिये पुद्गल के आश्रित होने से पौगलिक हैं । भाव वचन को सामर्थ्य से युक्त प्रात्मा के द्वारा प्रेरित होकर जो पुद्गल परमाणु वचन रूप से परिणत होते हैं ,वे द्रव्य वचन हैं । द्रव्य वचन श्रोत्रेन्द्रिय के विषय होते हैं।
प्रश्न :-वचन अमूर्त हैं, अतः उनको पौद्गलिक कहना ठीक नहीं है ?
उत्तर :- वचन अमूर्त नहीं हैं किन्तु मूर्त हैं, और इसीलिये पौद्गलिक भी हैं। शब्दों का मूर्तिमान् द्रव्यकर्ण के द्वारा ग्रहण होता है, दीवाल आदि मूतिमान् द्रव्य के द्वारा शब्द का प्रवरोध देखा जाता है, तीव्र भेरी आदि के शब्दों के द्वारा मन्द मच्छर
आदि के शब्दों का व्याघात होता है, मूर्त वायु के द्वारा भी शब्द का व्याघात होता है । विपरीत. वायु चलने से शब्द अपने अनुकूल देश में नहीं पहुंच पाता, इन सब कारणों से शब्द में मूर्तत्व सिद्ध होता है । मूर्त द्रव्य के द्वारा ग्रहण, अवरोध, अभिभव आदि अमूर्त वस्तु में नहीं हो सकते।
मन के भी दो भेद हैं-द्रव्यमान और भावमान । ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम होने पर अंगोपांग नामकर्म का उदय होने पर गुरण और दोषों के विचार करने में समर्थ आत्मा के उपकारक जो पुद्गल मन रूप से परिणत होते हैं, वे द्रव्यमन हैं। भावमन लब्धि और उपभोग रूप होता है और द्रव्यमन के आश्रित होने से पौद्गलिक है। प्रश्न :-मन अणमात्र और रूपादि गुणों से रहित एक भिन्न, द्रव्य है ।
उसको पौद्गलिक कहता ठीक नहीं है ? उत्तर :- यदि मन अणुमात्र है, तो इन्द्रिय और प्रात्मा से उसका सम्बन्ध है या नहीं? यदि सम्बन्ध नहीं है, तो वह आत्मा का उपकारक नहीं हो सकता । और आत्मा के साथ मन का सम्बन्ध है, तो एक देश में ही सम्बन्ध हो सकेगा, तब प्रत्य देशों में वह उपकारक नहीं हो सकेगा। अदृष्ट के कारण अलातचक्र की तरह मन का पारमा के सब प्रदेशों में परिभ्रमण मातना भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रात्मा अदृष्ट नैयायिक मत के अनुसार स्वयं क्रिया रहित है, अतः बहू. मन. की क्रिया में भी कारण नहीं हो सकता। क्रियावान् वायु आदि के गुरण ही अन्यत्र क्रिया हेतु हो सकते हैं।
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