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________________ अध्याय : पाठवा. ] [ ५४७ ज्ञानावरण और बीर्यान्तराय के क्षयोपशम होने पर और अंगोपांग नीमकर्म के उदय होने पर शरीर के भीतर से जो वायु बाहर निकलती है; उसको प्रारण और जो वायु बाहर से शरीर के भीतर जाती है, उसको अपान कहते हैं। मन और प्रासापान का भी मूर्त द्रव्य से प्रतिघात प्रादि देखा जाता है; इसलिये ये भी मूर्त हैं किसी के गिरते मन का इसिवा और मदिरा प्रांदि से अभिभव देखा जाता है। हाथ आदि से मुख को बन्द कर देने पर प्राणापान का प्रतिघात और गले में कफ अटक जाने पर श्वासोच्छवास का अभिभव भी देखा जाता है। प्रारणापान क्रिया के द्वारा जीव का अस्तित्व सिद्ध होता है। शरीर में जो श्वासोच्छ्वास क्रिया होतो है, उसका कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये, क्योंकि कर्ता के बिना क्रिया नहीं हो सकती और जो वासोच्छ्वास क्रिया का कर्ता है, वही जीव है । . उक्त शरीर प्रादि पुगल के उपकार जीव के प्रति कैसे हैं -- सुख दुःखं जीवित मरसोयग्रहाश्च ॥१२५७।। सुख, दुःख, जीवितं और मरण ये भी जीव के प्रति पुद्गल के उपकार हैं । साता वेदनीयं के उदय से सुख और असाता बेंदनीय के उदय से दुःख होता है। प्रायु कर्म के उदय से जीवन और आयु कर्म के विनाश से मरण होता है। ये सुख प्रादि मुर्त कारण के होने पर होते हैं, इसलिये ये पौद्गलिक हैं । सूत्रगत उपग्रह शब्द इस बात को सूचित करता हैं कि पुद्गल का पुद्गल के प्रति भी उपकार होता है । जैसे काँसे का बलन भस्म से साफ हो जाता है, मैला जल फिटकरी आदी से स्वच्छ हो जाता है और मरम लोहा जल से ठंडा हो जाता है । सूत्रगत 'च' शब्द यह सूचित करता है कि इन्द्रिय आदि अन्य भी पुद्गल के उपकार जीव का उपकार क्या है परस्परोपग्रहों जीवानाम् ॥१२५८॥ जीव परस्पर उपकार करते हैं, जैसे पिता-पुत्र, स्वामी-सेवक और गुरु-शिष्य प्रादि । स्वामी धनादि के द्वारा, सेवक अनुकल कार्य के द्वारा स्वामी का उपकार करता है । गुरु शिष्य को विद्या देता है तो शिष्य शुश्रूषा प्रादि से गुरु को प्रसन्न रखता है। सूत्रगत . उपग्रह शब्द सूचित करता है कि सुख, दुःख, जीवित पौर मरण द्वारा भी जीव परस्पर उपकार करते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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