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________________ ५४८ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण काल का उपकार वर्तना परिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥१२५६।। वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व, अपरत्व ये काल द्रव्य के उपकार हैं। कहीं 'वर्तना परिणामः क्रिया' इन तीनों पदों में स्वतन्त्र विभक्तियां भी देखी जाती हैं। कहीं 'वर्तना परिणाम क्रिया:' ऐसा समस्त पद उपलब्ध होता है । सब पदार्थों में स्वभाव से ही प्रतिसमय परिवर्तन होता रहता है. लेकिन उस परिवर्तन में जो बाह्य कारण है, वह परमाणुरूप काल द्रव्य है । काल द्रव्य के निमित्त से होने वाले परिवर्तन का नाम वर्तना है । वर्तना से काल द्रव्य का अस्तित्व सिद्ध होता है। चावलों को बर्तन में अग्नि पर रखने के कछ समय बाद प्रोदन (भात) बन जाता है। चावलों से जो प्रोदन बना वह एक समय में और एक साथ ही नहीं बना, किन्तु चावलों में प्रत्येक समय सूक्ष्म परिणमन होते-होते अन्त में स्थूल परिणाम दृष्टिगोचर होता है । यदि प्रति समय सूक्ष्म परिणमन न होता तो स्थल परिणमन भी नहीं हो सकता था । अतः चावलों में जो प्रति समय परिवर्तन हुआ वह काल रूप बाह्य कारण की अपेक्षा से ही हुआ। इसी प्रकार सब पदर्थों में परिण मन काल द्रव्य के कारण ही होता है । काल द्रव्य निष्क्रिय होकर भी निमित्त मात्र से सब द्रव्यों की वर्तना (क्रिया) में हेतु होता है। ___ एक पर्याय को निवृत्ति होकर दूसरे पर्याय की उत्पत्ति होने का नाम परिगाम है ! जीव के परिणामः क्रोध, मन, माया, लोभादि हैं। पुद्गल का परिणाम वादि हैं। धर्म, अधर्म और आकाश का परिणाम अगुरुलघु गुरणों की वृद्धिहानि से होता है। हलन चलन का नाम क्रिया है। क्रिया के दो भेद हैं-प्रायोगिकी और वैस्त्रसिकी। शकट (गाड़ी) आदि में क्रिया दूसरों के द्वारा होती है । इसको प्रायोगिकी क्रिया कहते हैं । मेघ आदि में क्रिया स्वभाव से ही होती है। इसको वैस्त्रसिकी क्रिया कहते हैं। ___ छोटे और बड़े के व्यवहार को परत्वापरत्व कहते हैं । क्षेत्र और काल की अपेक्षा से परत्वापरत्व व्यवहार होता है, लेकिन यहाँ काल का प्रकरण होने से कालकृत परत्वापरत्व का ही ग्रहण किया गया है । कालकृत परत्वापरत्व से समीप देशवर्ती और ब्रतादि गुरगों से रहित वृद्ध चाण्डाल को बड़ा और दूर देशदर्ती प्रतादि गुणों से सम्पन्न ब्राह्मण बालक को छोटा कहते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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