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अध्याय : पाठवा
[ ५४६ परिणाम, किया परस्वापरत्व, प्रावली, घड़ी, घण्टा, दिन आदि का कारण व्यवहार काल है। सूर्यादि को क्रिया से जो समय, प्रावली प्रादि का व्यवहार होता है, वह व्यवहार कालकुत है । एक पुद्गल परमारण, को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक जाने में जो काल लगता है, उसका नाम समय है और उस समय का कारण मुख्य काल है । व्यवहार में भूत, भविष्यत् आदि व्यवहार मुख्यतया होते हैं।
यद्यपि परिणाम प्रादि वर्तना के ही विशेष या भेद हैं, लेकिन काल द्रव्य के मुख्य और व्यवहार ये दो भद बतलाने के लिए सबका ग्रहण किया गया है। मुख्य काल वर्तना रूप है और व्यवहार काल परिणाम, क्रिया और पस्त्वापरत्व रूप है। पुद्गल का स्वरूप---
स्पर्शरस पंध वसवन्तः पुद्गलाः ॥१२६०॥
पुद्गल में स्पर्श, रस, गंध और वर्ण ये चार गुण पाये जाते हैं। कोमल, कठोर, हलका, भारी, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रक्ष ये स्पर्श के पाठ भेद हैं । खट्टा, मीठा, कडुवा, करायला और चिरपरा ये रस के पांच भेद हैं, लवण रस का भी रसों में ही अन्तर्भाव है । सुगन्ध और दुर्गन्ध ये गंध दो भेद हैं । काला, नीला, पीला, लाल और सफेद ये वर्ण के पांच भेद हैं। इनके भी संख्यात, असंख्यात और अनन्त उत्तर भेद होते हैं । जिन अग्नि आदि में रस आदि प्रकट नहीं है, वहाँ स्पर्श की सत्ता द्वारा शेष का अनुमान कर लेना चाहिए।
यद्यपि 'रूपिरणः पुद्गलाः' इस पूर्वोक्त सूत्र से ही पुद्गल के रूप रसादि दाले स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, लेकिन वह सूत्र पुद्गल को रूप रहित होने की आशंका के निवारण के लिए कहा गया था। 'नित्यावस्थितान्य रूपारिण' इस सूत्र से पुद्गल में भी अरूपित्व की प्राशंका थी । अतः यह सूत्र पुद्गल का पूर्ण स्वरूप बतलाने के लिये है, निरर्थक नहीं है। पुद्गल की पर्याय
शब्द बध सौम्य स्थौल्य संस्थान भेव तमश्छाया तपोद्योत बन्तश्च ॥१२६।।
पुद्गल द्रव्य में शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, संस्थान, भेद, छाया, तम, प्रापत और उद्योत रूप से परिणमन होता रहता है अर्थात् में पुद्गल की पर्यायें हैं। शब्द के दो
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