________________
५४२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
है, और उस स्पर्श के कारण समस्त अलोकाकाश की स्थिति और उसमें परिवर्तन होता है ।
एक प्रदेशादिषु भाग्य: पुद्गलानाम् ।।१२५१११
पुद्गल द्रव्य का अवगाह लोकाकाश के एक प्रदेश को आदि लेकर असंख्यात प्रदेशों में यथा योग्य होता है । आकाश के एक प्रदेश में एक परमाणु से लेकर असंख्यात और अनन्त परमाणुओं के स्कन्ध का अवगाह हो सकता है । इसी प्रकार आकाश के दो, तीन यादि प्रदेशों में भी पुद्गल द्रव्य का श्रवगाह होता है ।
प्रश्न :
धर्म और अधर्म द्रव्य अमूर्त हैं, इसलिए इनके श्रवगाह में कोई विरोध नहीं है; लेकिन अनन्त प्रवेश वाले मूर्त पुद्गलस्कन्ध का असंख्यात प्रदेशी लोकाकाश में श्रवगाह फँसे हो सकता है ?
उत्तर :- सूक्ष्म परिगमन और अवगाहन शक्ति होने से आकाश के एक प्रदेश में भी अनन्त परमाणु वाला पुद्गल स्कन्ध रह सकता है । जैसे एक कोठे में अनेक दीपकों का प्रकाश एक साथ रहता है । इस विषय में प्रागम भी प्रमाण है । प्रवचनसार में कहा है कि सूक्ष्म, बादर और नाना प्रकार के अनन्तानन्त पुद्गल स्कन्धों से यह लोक ठसाठस भरा है।
इस विषय में रुई की गांठ का दृष्टान्त भी उपयुक्त है। फैली हुई रुई अधिक क्षेत्र को घेरती है, जबकि गांठ बांधने पर अल्प क्षेत्र में या जाती है ।
असंख्येय भागादिषु जीवानाम् ।।१२५२ ।।
जीवों का प्रवाह लोकाकोश के असंख्यातवें भाग से लेकर समस्त लोकाकाश में है । लोकाकाश के असंख्यात भागों में से एक, दो, तीन यादि भागों में एक जीव रहता है, और लोक पूरण समुद्धात के समय वही जीव समस्त लोकाकाश में व्याप्त हो जाता है ।
प्रश्न :- यदि लोकाकाश के एक भाग में एक जीव रहता है, तो एक भाग में द्रव्य प्रमाण से शरीर युक्त श्रनन्तानन्त जीव राशि कैसे रह सकती है ?
उत्तर :- सूक्ष्म और बादर के भेद से जीवों का एक यदि भागों में अवगाह होता है । अनेक बादर जीव एक स्थान में नहीं रह सकते, क्योंकि वे परस्पर में प्रतिघात ( बाधा ) करते हैं । लेकिन परस्पर में प्रतिघात न करने के कारण एक