________________
अध्याय : पाठवां ]
[ ५४१ धर्मादि के आधार की तरह प्रकाश का भी दूसरा आधार होना
चाहिए? उत्तर :-आकाश से अधिक परिमाण वाला अर्थात् बड़ा दूसरा कोई द्रव्य नहीं है, जो प्रकाश का आधार हो सके । अतः आकाश किसी का प्राधेय नहीं हो सकता । आकाश भी व्यवहार नय की अपेक्षा धर्मादि द्रव्यों का आधार माना गया है । निश्चय नय से तो सब द्रव्य अपने अपने प्रावार से हैं । आकाश और अन्य द्रव्यों में आधार-प्राधेय सम्बन्ध का तात्पर्य यही है कि आकाश से बाहर अन्य द्रव्य नहीं है । एवम्भूतनय की अपेक्षा से तो सभी द्रव्य स्वप्रतिष्ठित ही हैं । एवम्भूत अर्थात् निश्चयनय । परमात्म प्रकाश (१----५) में सिद्धों को स्वात्म निवासी ही बतलाया है ।
प्रश्न :--प्राधार और प्राधेय पूर्वापर काल भावी होते हैं। जैसे घड़ा
पहले रखा हुआ है और उसमें बेर प्रादि पीछे रख दिये जाते हैं। आकाश और धर्मादि द्रव्य समकाल भाषी हैं, इसलिए इनमें
सहारनय से भाधा-शालेय म्नन्ध नहीं बन सकता? उत्तर :-कहीं-कहीं समकालभावी पदार्थों में भी प्राधार-प्राधेय सम्बन्ध पाया जाता है, जैसे घट और घटके रूपादिक में । इसी प्रकार समकाल भावी प्रकाश और धर्मादि द्रव्यों में उक्त सम्बन्ध है।
लोक और अलोक का विभाग धर्म और अधर्भ द्रव्य के सद्भाव से होता है । यदि धर्म और अधर्म द्रव्य न होते तो जीव और पुद्गल की जहाँ कि धर्म और अधर्म द्रव्य हैं, वहां लोक और उसके बाहर अलोक गति और स्थिति के अभाव हो जाने से लोकालोक का विभाग भी न होता।
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१२५०।।
धर्म और अधर्म द्रव्य समस्त लोकाकाश में तिल में तेल की तरह व्याप्त हैं। इनमें अवगाहन शक्ति होने से परस्पर में व्याघात नहीं होता है । ..... प्रश्न :--प्रलोकाकाश में अधर्म द्रव्य न होने से प्राकाश की स्थिति और
काल द्रब्ध न होने से प्राकाश में परिणमन कैसे होता है ? उसर :-जैसे जल के समीप स्थित, उष्णा लोहे का गोला, एक ओर से जल को खींचता है, लेकिन जल पूरे लोह पिण्ड में व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार लोक के अन्त भाग के निकट का अलोकाकाश अधर्म और काल द्रव्य का स्पर्श करता