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[गो. प्र. चिन्तामणि मन्त्रः प्रणवपूर्वोऽयं निश्शेषाभीष्टसिद्धिदः । ऐहिकानेक कामार्थ मुक्त्यर्थ प्रणवच्युतः ॥५५८।।
तत्पश्चात् पूर्वोक्त पाठ रात्रियों के व्यतीत होने के पश्चात् इस कमल के पत्रों पर वर्तने वाले अक्षरों को अनुक्रम से निरूपरण' करके देखें। इस प्रकार इस प्रक्रिया को प्रथम विघ्न के समूह की श.न्ति के लिए प्रालंबन करके तत्पश्चात् प्रणवजित सात अक्षर स्वरूप "रामो अरहताएं" इस मन्त्र का ध्यान करे । जब इस मन्त्र को प्रगावपूर्वक ध्यावे, तब यह समस्त मनोवांछित सिद्धि का देने वाला है तथा इस लोक सम्बन्धी अनेक कार्यों के लिए है और प्रणवजित ध्यान करने से यह मन्त्र मुक्ति का कारण है । .
(चित्र नं. २६ देखें) जन्म समूह का नाश करने वाली विद्या का फल---
स्मर मन्त्रपदं बान्यज्जन्मसंघात घातकम् । रागाध नतमस्तोमप्रध्वंसर विमण्डलम् ॥५५६।।
अब कहते हैं कि है मुने, तू अन्य एक मन्त्र पद का स्मरण कर, क्योंकि वह .. मन्त्र जन्म समूह को घात करने वाला है और रागादिक रूप तीव अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्यमण्डल के समान है। वह मन्त्र 'श्रीमदृषभादि वर्द्धमानान्तेभ्यों नमः" ऐसा है। पाप भक्षिरिण विद्या और उसका प्रभाव
मनः कृत्वा सुनिष्कम्पं तां विद्यां पापभक्षिणीम् । स्मर सत्त्वोपकाराय या जिनेन्द्रः प्रकीर्तिता ॥५६॥
तत्पश्चात् हे मुने, तु निश्चल मन से उस पापभक्षिरगी विद्या का स्मरण कर, .. जिसको कि समस्त जीवों के उपकारार्थ श्री जिनेन्द्र भगवान ने कही है। वह विद्या यह है “ॐ अईन्मुख कमलवासिनि पापात्मक्षयंकरि शुतज्ञान ज्वाला सहस्र प्रज्वलिते सरस्वति मत्पापं हन हन दह दह क्षा क्षीं थू क्षः क्षीरबर धवले अमृतसंभवे व वं हूं हूँ स्वाहा' । ये पाप भक्षिणी विद्या के अक्षर हैं। ...
चेतः प्रसत्तिमाधत्ते पापपङ्कः प्रलीयते । प्राधिर्भवति विज्ञानं मुनेरस्याःप्रभावतः ॥५६१॥ .
इस पापक्षिणी विद्या के प्रभाव से मुनि का चित्त प्रसन्नता को धारण करता है, पाप रूपी पंक प्रलय हो जाता है और विशिष्ट ज्ञान प्रकट होता है । ...
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