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श्रध्याव: पांचवां ]
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व ध्यानी के उपसर्ग करते वाले क्रूर जनु वा ध्यान की नाश करने वाले व्यन्तरादिक जिस ध्यान से उपशमला को प्राप्त होते हैं, उस व्यान का विस्तार से वर्गान करते हैं ।
दिग्दलाष्टक सम्पूर्णे राजीवे सुप्रतिष्ठितम् । स्मरत्वात्मानमत्यन्त स्फुर ग्रीष्मार्क भास्करम् ।। ५५१ ।।
प्रणवाद्यस्य मन्त्रस्य पूर्वादिषु प्रदक्षिणम् । विचिन्तयति पत्रेषु वर्णकमनुक्रमात् ॥१५५२१।
सर्वाशासन्मुखः परम् ।
श्रधिकृत्य छदं पूर्व स्मरत्वष्टाक्षरं मन्त्रं सहस्त्रकं शताधिकम् ।।५५३ ।। प्रत्यहं प्रतिपत्रेषु महेन्द्रा शाखनुक्रमात् ।
अष्ट रात्रं जपेद्योगी प्रसन्नांमल मानसः || ५५४ || तस्याचिन्त्य प्रभावेण क्रूराशय कलङ्किताः । त्यजन्ति जन्तवो दर्प मित्रस्ता इव द्विपा: ११५५५||
आठ दिशा सम्बन्धी ग्राउ पत्रों से पूर्ण कमल में भले प्रकार स्थापित और अत्यन्त स्फुरायमान ग्रीष्मऋतु के सूर्य के समान देदीप्यमान ग्रात्मा का स्मरण करे | are है, आदि में जिसके ऐसे मन्त्र को पूर्वादिक दिशाओं में प्रदक्षिणा रूप एक-एक पत्र पर अनुक्रम से एक-एक यक्षर का चिन्तवन करें। वे अक्षर “ॐ रामो अरहंताणं” ये हैं । इनमें से प्रथम पत्र को मुख्य करके सर्व दिशाओंों के सन्मुख होकर इस अष्टाक्षर मंत्र को ग्यारह सौ बार चिन्तवन ( ध्यान ) करें। इस प्रकार प्रतिदिन प्रत्येक पत्र में पूर्व दिशादिक के अनुक्रम से आठ रात्रि पर्यन्त प्रसन्न होकर जपे । उसके अचिन्त्य प्रभाव से क्रूरचित जीव सिंह से भयभीत होकर जिस प्रकार हाथी गर्व छोड़ देते हैं, उसी प्रकार अपना गर्व छोड़ देते हैं ।
प्रणवर्जित सप्ताक्षरी विद्या और उसके ध्यान का फल -
अष्टरात्रे व्यक्तिन्ते कमलस्यास्पदत्तिनः । निरूपयति पत्रेषु वर्णानेताननुक्रमात् ।। ५५६।। श्रालम्ब्य प्रक्रियामेना पूर्व विघ्नोपशान्तये । पश्चात्सप्ताक्षरं मन्त्रम् ध्यायेत्प्रणव वर्जितं ।। ५५७ ॥
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