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स्त्रों, बीज का कहां ध्यान करना चाहिये ?
[ गो. प्र. चिन्तामणि
ततो ध्यायेन्महाबीजं स्त्रीकारं छिन्नमस्तकम् । श्रायुतं दिव्यं विस्फुरन्तं, मुखोदरे ।।५४६ ॥
तत्पश्चात् महाबीज जो 'स्त्री' ऐसा अक्षर और छिन मस्तक अर्थात् जिस पर विन्दु ग्रनुस्वार नहीं है, उसको श्रनाहत सहित दिव्य मुख पर स्कुरायमान होता हुआ चितवन करें । चित्र नं० २५ ।
वर्द्धमान प्रभु के मूख से निकलने वाली कौन विद्या है ?
श्री वीर वदनोद्गीर्णा विद्यां चाचिन्त्यविक्रमाम् ।
कल्पवल्ली मिचिन्त्य फल संपादन वामाम्
और भी वीर वर्द्धमान भगवान के मुख से निकली हुई विद्या का चितवन करें कैसी है, वह विद्या ? ग्रचिन्त्य पराक्रम वाली और कल्पवेल के समान अचिन्त्य फल देने में समर्थ है। ऐसी विद्या "ॐ जोगे मत दे भव्ये भविस्से जिगपारिस्से स्वाहा " तत्पश्चात् ऐसा मंत्र है, ॐ ह्री स्वहं नमो नमो नमः" ऐसे अक्षर हैं ।
इस विद्या का ध्यान करने से क्या फल मिलता है ?
से पहले ह्रीं
विद्यां जपति य इमां निरन्तरं शान्त विश्वविस्पन्दः ।
अणिमादि गुणांलब्ध्वा ध्यानी शास्त्रात तरति ।। ५४८ ॥
जो ध्यानी शान्त वेग निश्चल होकर इस विद्या को निरन्तर जगता है, वह श्रणिमादिक गुणों को प्राप्त होकर, शास्त्र समुद्र के पार हो जाता है अर्थात् श्रुत केवली होता है 1
त्रिकाल विषयं साक्षाज्ज्ञान मस्योपजायते ।
'farara प्रबोधश्च सतताभ्यासयोगतः ॥१५४६॥
इस विद्या को ध्यान करने वाले के निरन्तर अभ्यास करने से समस्त तत्त्वों का ज्ञान और त्रिकाल विषयक साक्षात् जान कहिये केवलज्ञान उत्पन्न होता 1
• समस्त उपसर्ग हर विद्या के ध्यान का फल --
साम्यन्ति जन्तवः क्रूरास्तथान्ये व्यन्तरादयः । ध्यान विध्वंस कर्तारो येन तद्धि प्रपञ्च्यते ॥५५०॥