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________________ अध्याय : पांचवां ] सप्ताक्षरीविद्या का स्मरण कैसे करें ? यदि साक्षात्समुद्विग्नो जन्मदाबो संक्रमात् । तदा स्मरादि मन्त्रस्य प्राचीनं वर्ण सप्तकम् ॥ ५४१ || [ २७३ हे मुने, जो तू संसाररूप अग्नि के तीव्र संक्रम ( संयोग ) से उद्वेगरूप हुआ है, ग्रंथांत् दुःखी हुआ है तो यदि मंत्र जो पंच नमस्कार मन्त्र है, उसके पहिले सात अक्षरों का ध्यान करं, वे सात अक्षर 'मो ग्रहंता' ये हैं | चित्र नं० २३ ख । प्रणव, शून्य तथा अनाहत ये तीन अक्षरों को कहाँ स्थापन कर ध्यान करना चाहियेयत्र प्रणवं शून्यमनाहतमिति त्रयम् । एतदेव विदुः प्राज्ञास्त्रैलोक्य तिलकोत्तमम् ॥५४२॥ जो इस प्रकरण में प्रणव और शून्य तथा अनाहूत ये तीन अक्षर हैं, इन तीनों (ॐ ह् अ ) अक्षरों को ही बुद्धिमानों ने तीन लोक के तिलक समान कहा है । नासाग्रदेश संलीनं कुर्वन्नत्यन्त निर्मलम् | : ध्याता ज्ञानमवाप्नोति प्राप्यपूर्व गुरणाष्टकम् ।।५४३ ॥ इन तीन अक्षरों को नासिका के अग्र भाग में अत्यन्त लीन करता हुआ, व्यानी अणिमा महिमादिक ग्राठ ऋद्धियों को प्राप्त होकर तत्पश्चात् प्रति निर्मल ज्ञान ( केवलज्ञान ) को प्राप्त होता है । शङ्खदुकुन्द धवला ध्याता देवास्त्रयो विधानेन । जनयन्ति सर्व विषयं बोधं कालेन तद्धयानात् ॥ ५४४ ।। पूर्वोक्त ये तीन देव (अक्षर) शंख के समान, कुन्द के पुप्प के समान तथा चन्द्रमा समान विधानपूर्वक ध्याये जायें तो इनके ध्यान से कितने ही काल में समस्त विषयों का ज्ञान करने वाला केवलज्ञान उत्पन्न होता है । चित्र नं० २४ । अंत में है हंसपद जिसके ऐसे प्रराव और मायाबीजों का ध्यान कहाँ करना चाहिये ? प्रणव युगलस्य युग्मं पार्श्वे माया युगं विचिन्तयति । भूर्द्धस्थं हंस पवं कृत्वा व्यस्तं वितन्द्रात्मा ॥। ५४५॥ ne युगल कहिये दो प्रकार का युग्म और दोनों तरफ दो माया युगल ह्रीं ह्रीं ऐसे और इनके उपर हंस पद रखकर, प्रमाद रहित होकर, ध्यानी भिन्न-भिन्न चितवन करे | यह मंत्र 'ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं हंसः' ऐसा है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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