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________________ %3DUR A rre --- M ५३६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि उक्त धर्म आदि चार द्रव्य हैं । जिसमें गुण और पर्याय पाये जाय उनको द्रव्य कहते हैं। नैयायिक कहते हैं कि जिसमें द्रव्यत्व नामक सामान्य रहे, वह द्रव्य है। ऐसा कहना ठीक नहीं है । जब द्रव्यत्व और द्रव्य दोनों की पृथक्-पृथक् सिद्धि हो, तब द्रव्यत्व का द्रव्य के साथ सम्बन्ध हो सकता है। लेकिन दोनों की पृथक्-पृथक् सिद्धि नहीं है । और यदि दोनों की पृथक् सिद्धि है, तो बिना द्रव्यत्व के भी द्रव्य सिद्ध हो गया, तब द्रव्यत्त्व के सम्बन्ध मानने की क्या आवश्यकता है ? इसी प्रकार गुणों के समुदाय को द्रव्य कहना भी ठीक नहीं है, कि पु और समुदाय में अभेद मानने पर एक ही पदार्थ रहेगा और भेद मानने पर गुणों की कल्पना व्यर्थ है, क्योंकि बिना मुणों के भी समुदाय सिद्ध है। ...... गुण और द्रव्य में कथञ्चित् भेदाभेद मानने से कोई दोष नहीं आता। मुग और द्रव्य पृथक्-पृथक् उपलब्ध नहीं होते, इसलिये उनमें अभेद है और उनके नाम, लक्षण, प्रयोजन आदि भिन्न भिन्न हैं, इसलिये उनमें भेद भी है। ....... पूर्व सूत्र में धर्मः प्रादि बहुत पदार्थ हैं, इसलिए इस सूत्र में धर्म आदि का द्रव्य के साथ समानाधिकरण होने से द्रव्य शब्द को बहुवचन कहा है, लेकिन समानाधिकरण के कारण द्रव्य शब्द पुल्लिग नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य ..शब्द सदा नपुसक लिङ्ग ummmnaniainm -- - - - - जीव वध्य किस प्रकार के हैं--- - जीवाश्च ॥१२४२।। जीव भी द्रव्य है। आगे काल को भी द्रव्य बतलाया है। इस प्रकर धर्म, अधर्म, भाकाश, पुद्गल, जीव और काल ये छह द्रव्य हैं। प्रश्न :-प्रागे 'गुरणपर्ययवद् द्रव्यम्' इस सूत्र में द्रव्य का लक्षण बतलाया है। इसी से यह सिद्ध हो जाता है कि धर्म प्रादि प्रध्य हैं। फिर यहां द्रव्यों की गणना करना ठीक नहीं है ? असर :-~-यहां द्रव्यों की गणना इसलिये की गई है कि द्रव्य छह ही हैं । अन्य लोगों के द्वारा मानी गयो द्रव्य की संख्या ठीक नहीं है। नैयायिक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, मात्मा और मन ये
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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