SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 624
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ... अध्याय आठवां : द्रव्य-वर्णन अजोय तत्त्व का वर्णन अजीवकाया धर्माधर्माकाश पुद्गलाः १२४०॥ . . धर्म, अधर्म, अाकाश और पुदगल ये चार द्रव्य अजीवकाय हैं। शरीर के समान प्रलय या पिण्ड रूप होने के कारण इन द्रव्यों को अजीवकाय कहा है। यद्यपि काल द्रव्य भी अजीव है, लेकिन प्रचय रूप न होने के कारण काल को इस सूत्र में नहीं कहा है । काल द्रव्य के प्रदेश मोती के समान एक दूसरे से पृथक है। निश्चयनय से एक पुद्गल परमाणु बहुप्रदेशी नहीं है, किन्तु उपचार से एक पुद्गल परमाणु भी बहुप्रदेशी कहा जाता है, क्योंकि उसमें अन्य परमाणुओं के साथ मिलकर पिण्डरूप परिणत होने की शक्ति है। प्रश्न :--'असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधमक जीवानाम्' ऐसा प्रागे सूत्र है । उसी से यह निश्चय हो जाता है कि धर्म आदि द्रव्य बहुप्रदेशी हैं । फिर इन द्रव्यों को बहुप्रदेशी बतलाने के लिये इस सूत्र में कार्य शब्द का ग्रहण क्यों किया? उत्तर :---इस सूत्र में काय शब्द यह सूचित करता है कि धर्म आदि द्रव्य बहुप्रदेशी हैं और आगे के सूत्रों से उन प्रदेशों का निर्धारण होता है कि किस द्रव्य के कितने प्रदेश हैं ! काल द्रव्य के प्रदेश प्रचयरूप नहीं होते हैं, इस आत्त को बतलाने के लिये भी इस सूत्र में काय शब्द का ग्रहण किया है । 'अजीवकाय' इस शब्द में अजीय विशेषरण है और काय विशेष्य है। इसलिये यहां विशेषरण विशेष्य समास हुआ है । किन्हीं दो पदार्थों में व्यभिचार (असम्बन्ध) होने पर किसी एक स्थान में उनके संबंध को बतलाने के लिये विशेषण विशेष्य समास होता है। काल द्रव्य अजीव है, लेकिन काय नहीं है, जीव द्रव्य काय है, लेकिन अजीव नहीं है । अत: अजीव और काय में व्यभिचार होने के कारण विशेषण विशेष्य समास हो गया है। . .. द्रव्य का लक्षण द्रव्याणि ॥१२४१॥ THE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy