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________________ PRES 545AHINTEERTHum - ENTRAL - -- - I ANERAHMANTRA । m erowata- LRideoamwomram -u-imanama.min....... [ गो. प्र. चिन्तामणि सभी सिद्ध भगवान सिद्ध क्षेत्र के उपरिम भाग तनुवात के चतुर्थ भाग में विराजमान है । अन्तिम, शरीर के प्रमाण से किंचित् न्यून आत्मप्रदेश वाले हैं । आठवीं पृथ्वी के ऊपर सात हजार पचास धनुष जाकर सिद्धों का आवास है । अर्थात् सर्वार्थसिद्धि से १२ योजन ऊपर की पाठवीं पृथ्वी है । यह एक राजू चौड़ी ७ राजू लम्बी है, किन्तु मोटी योजन मात्र ही है ! इस पृथ्वी के मध्य में सिद्ध शिला है । बह भी मोटी ८ योजन मात्र ही है । मध्य में गोलाकार है । जो कि ४५००००० योजन प्रमाण है । इसके ऊपर ४२५ धनुष कम १ योजन में तीन वासवलय है ! सिद्ध परमेष्ठी में अंतिम तनुवात बलय में स्थित है । १ योजन में ८००० धनुष होते हैं । उसमें से ७०५० धनुष पर जाकर सिद्धों का आवास है। जो कि १०५०५६२६० १६५३, १ बटे ८ योजन प्रमाण है । तनुवात बलय १ कोस का है। एक कोस में २०० धनुष होते हैं । इसमें ४२५ धनुष घंटाइये, तब १५७५ धनुष होता है । २००० - ४२५=१५७५ धनुष । तनुबस्त वलय के कोस प्रमाणांगुल की अपेक्षा से है । और सिद्धों की अवगाहना व्यवहारांगुल की अपेक्षा से है । इसलिये १५७५ को ५०० से गुणा करके व्यवहार धनुष बना लीजिये १५७५४५०० = ७८७ - ५.०० तनुवात की मोटाई को ५०० से गुणा करके १५.०० का भाग देने पर सिद्धों की उत्कृष्ट : अवगाहना का प्रमाण होता. है। एवं ६००००० का भाग देने पर जघन्य अवगाहना होती है । जैसे-१५७५४ ५०० : १५०० - ५२५ धनुष/१५७५४५.०० + ६००००० - ७ बटे ८ धनुष = ३, १ बटे २ हाथ । इसमें सिद्धों की जघन्य अवगाहना ७ धनुष के आठ भाग है । धनुष के चार हाथ होते हैं । अतः ७४४ =२८, २८:६-३, १ बटे २ । सिद्धों की जघन्य अवगाहना ३, १ बटे २ हाथ है । एवं उत्कृष्ट अवगाहना ५२५ धनुष है । ..new ... .. - .. . - Emoresearra ....
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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