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________________ अध्याय : सातवां [ ५३३ विशेष- चन्द्रमा की एक पत्य और एक लाख वर्ष सूर्य की एक पत्य और एक हजार वर्ष, शुक्र की एक पल्य और सौ वर्ष बृहस्पति की एक पत्थ, बुध को ग्राधा पल्य; नक्षत्रों की आधा पल्य और प्रकीर्शक ताराओं की १ बटे ४ पस्य उत्कृष्ट श्रायु है । प्रकोक ताराधों की और नक्षत्रों की जघन्य स्थिति पल्य के आठवें भाग ( १ बटे पल्य) प्रभार है और सूर्यादिकों की जघन्य श्रायु पल्य के चौथे भाग ( १ बटे ४ पत्य) प्रमाण है । atefantaract सागरोपमानि सर्वेषाम् ।।१२३६ ।। 'समस्त लौकान्तिक देवों की आयु प्राठ सागर को हैं । इन देवों में जघन्य और उत्कृष्ट आयु का भेद नहीं है । सब लौकान्तिक देवों के शुक्ल लेश्या होती है । इनके शरीर की ऊंचाई पांच हाथ है । प्रश्न :- सिद्ध लोक और सिद्ध शिला का वर्णन कैसा है ? लम्बाई ७ राजू है एवं उत्तर :- सर्वार्थसिद्धि नामक इन्द्रक के ध्वज दण्ड से १२ योजन मात्र ऊपर जाकर "पाभावान की भावों पृथ्वी स्थित है, तीन भुवन के मस्तक पर स्थित इस पृथ्वी की पूर्व पश्चिम चौड़ाई १ राजू है. उत्तर दक्षिण मोटाई योजन मात्र है । अतः यह पृथ्वीलोक के अन्त तक पृथ्वी के ऊपर ३ वातवलय हैं । जो कुछ कम १ योजन खात वलय २ कोस, घनवात वलय १ कोस तनु बातबलव ४२५ धनुष कम १ कोस है । योजन मोटी है । इस मात्र है । घोि इस आठवी पृथ्वी के मध्य में रजतमयी, श्वेत छत्र के आकार वाला मनुष्य . क्षेत्र समान गोल पैतालीस लाख योजन विस्तृत "सिद्ध क्षेत्र" हैं । तिलोयपण्णत्तिः ग्रन्थ में इस क्षेत्र को "उत्तानधवल" क्षेत्र सदृश कहा है। इस क्षेत्र के मध्य की मोटाई योजन है । एवं क्रम से घटते घटते अंत में १ अंगुल मात्र हैं । अर्थात् यह शिद्ध शिला उपरिम भाग में तो समान रूप है और नीचे हानि वृद्धि रूप है । त्रिलोकसार में इस सिद्ध शिक्षा को औधे रखे हुए कटोरे के सदृश कहा है । यह शिला ४५००००० योजन विस्तृत है । और इसकी परिधि १४२३०२४६ योजन प्रमाण हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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