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अध्याय : आठवां ]
[ ५३७ नव द्रव्य मानते हैं । यह संख्या ठीक नहीं है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और मन का पुद्गल' द्रव्य में अन्तर्भाव हो जाता है।
जिनेन्द्र देव ने पुद्गल द्रव्य के छह भेद बतलाए हैं-अतिस्थूल, स्थूल-स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्म-सूक्ष्म । इनके क्रमशः उदाहरण ये हैं-पृथ्वी, जल, छाया, नेत्र के सिवाय शेष चार इन्द्रियों के विषय, कर्म और परमाणु । .. प्रश्न :-पुद्गल द्रव्य में रूप रस गंध और स्पर्श पाये जाते हैं। घायु और
मन में रूप आदि नहीं है । अतः पुद्गल में इनका अन्तर्भाव कैसे
होगा? उत्तर :- वायु में भी रूप प्रादि चारों गुण पाये जाते हैं । वायु में नैयायिक के मत के अनुसार स्पर्श है हो और स्पर्श होने से रूपादि गुरणो को भा मानना पड़ेगा । जहाँ स्पर्श है, वहां शेष गुण होना ही चाहिये । ऐसा भी कहना ठीक नहीं कि वायु में रूप है तो वायु का प्रत्यक्ष होना चाहिये, क्योंकि परमाणु में रूप होने पर भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । इसी प्रकार जल, अग्नि आदि में स्पर्श आदि चारों गुण पाये जाते हैं। चारों का परस्पर प्रविनाभाव है ।
मन के दो भेद हैं - द्रव्यमान और भायमन । द्रव्यमान का पुद्गल में और भावमान का जीव में अन्तर्भाव होता है। द्रव्यमान रूपादि युक्त होने से पुमल द्रव्य का विकार है। द्रव्यमन झानोपयोग का कारण होने से रूपादि युक्त (मूर्त) है। शब्द भी पौद्गलिक होने से मूर्त ही है, अतः नैयायिक का ऐसा कहना कि जिस प्रकार शब्द प्रमूर्त होकर ज्ञानोपयोग में कारण होता है, उसी प्रकार द्रव्यमन भी अमूर्त होकर ज्ञानोपयोग में कारण हो जायेगा, यह ठीक नहीं है ।
प्रत्येक द्रव्य के पृथक्-पृथक् परमाणु मानना भी ठीक नहीं है । जल के परमाणु पृथ्वी रूप भी हो सकते हैं और पृथ्वी के परमाणु जलरूप भी । जिस प्रकार वायु आदि का पुद्गल में अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार दिशा का आकाश में अन्तर्भाव हो जाता है; क्योंकि सूर्य के उदयादि की अपेक्षा प्रकाश के प्रदेशों की पंक्ति में पूर्व आदि दिशा का व्यवहार किया जाता है। ....
.. ये द्रव्य नित्य किस प्रकार हैं?-- ....... . . . . . .
नित्यावस्थितान्यरूपाणि ।।११४३॥
जीव आदि सभी द्रव्य नित्य, अवस्थित और अरूपी हैं। ये द्रव्य कभी नष्ट महीं होते हैं, इसलिये नित्य हैं। इनकी संख्या सदा छह ही रहती है अथवा ये कभी भी