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[ गो. प्र. चिन्तामणि अपने-अपने प्रदेशों को नहीं छोड़ते हैं, इसलिये अवस्थित हैं। द्रव्यों में नित्यत्व, और अवस्थित व द्रव्य नय की अपेक्षा से है । इन द्रव्यों में रूप, रस आदि नहीं पाये जाते, इसलिये अरूपी हैं। पुद्गल का स्वरूप----
रूपिणः पुद्गलाः ॥१२४४॥
पुद्गल द्रव्य में रूप, रस, गन्ध और स्पर्श पाये जाते हैं। इसलिये पुद्गल द्रव्य. रूपी है । जिस में पूरग और गलन हो वह पुद्गल है। पुद्गल के परमाणु, स्कन्ध
आदि अनेक भेद हैं. इसलिये सूत्र में बहुवचन का प्रयोग किया है । ये तीन द्रव्य किस प्रकार के हैं ?
श्रा आकाशादेक द्रव्याणि ।।
अाकाश पर्यन्त अर्थात् धर्म और आकाश-ये तीन द्रव्य एक-एक हैं । जीव या पुद्गल की तरह अनेक नहीं हैं ।
प्रश्न :--'पा प्राकाशावेककम्' ऐसे लघुसूत्र से ही काम चल जाता, फिर
__व्यर्थ ही द्रव्य शब्द का ग्रहण क्यों किया ?
उत्तर :- उक्त द्रव्य, द्रव्य की अपेक्षा एक-एक है, लेकिन क्षेत्र और भाव की अपेक्षा असंख्यात पोर अनन्त भो है, इस बात को बतलाने के लिये सूत्र में द्रव्य शब्द का ग्रहण आवश्यक है। ये द्रव्य निष्क्रिय किस प्रकार हैं ?
निष्क्रियाणि च ॥११४५।।
धर्म, अधर्म और प्राकाश ये द्रव्य निष्क्रिय भी हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने को क्रिया कहते हैं । इस प्रकार की क्रिया इन द्रव्यों में नहीं पाई जाती, इसलिये ये निष्क्रिय हैं। प्रश्न :-यदि धर्म प्रादि द्रव्य निष्क्रिय हैं, तो इनको उत्पत्ति नहीं हो सकती,
क्योंकि उत्पसि क्रियापूर्वक होती है। उत्पत्ति के प्रभाव में विनाश भी संभव नहीं है। अतः धर्म आदि द्रव्यों को उत्पाद-व्यय
और प्रौश्य युक्त कहना ठीक नहीं है? उत्तर :--यद्यपि धर्म प्रादि द्रव्यों में क्रिया निमित्तक उत्पाद नहीं है, फिर भी इनमें दूसरे प्रकार का उत्पाद पाया जाता है।