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________________ अध्याय : आठवां ] [ ५३६ स्वनिमित्त और परनिमित्त के भेद से दो प्रकार का उत्पाद धर्म आदि द्रव्यों में होता रहता है । इन द्रव्यों के अनन्त अगुरुलघु गुरणों में छह प्रकार की वृद्धि और छह प्रकार की हानि स्वभाव से ही होती रहती है, यही स्वनिमित्तक उत्पाद और व्यय है । मनुष्य आदि की गति, स्थिति और अवकाशदान में हेतु होने के कारण धर्म आदि द्रव्यों में पर प्रत्ययापेक्ष उत्पाद और विनाश भी होता रहता है । क्योंकि क्षण-क्षण में गति आदि के विषय भिन्न-भिन्न होते हैं और विषय भिन्न होने से उसके कारण को भी भिन्न होना चाहिये। प्रश्न :-क्रिया सहित जलादि ही मछली प्राधि की गति प्रादि में निमित्त होते हैं । धर्म प्रादि निष्क्रिय द्रव्य जीवादि की गति आदि में हेतु कैसे हो सकते हैं ? उत्तर :--ये द्रव्य केवल जीवादि की गति आदि में सहायक होते हैं, प्रेरक नहीं। जैसे चक्षु रूप के देखने में निमित्त होता है, लेकिन जो नहीं देखना चाहता उसको देखने की प्रेरणा नहीं करता। इसलिये धर्म आदि द्रव्यों को निष्क्रिय होने पर भी जीवादि की गति आदि में हेतु होने में कोई विरोध नहीं है। जीव और पुद्गल को छोड़कर शेष चार द्रव्य निष्क्रिय हैं। उध्यों के प्रदेशों की संख्या कितनी हैं असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मकजीयानाम् ।।१२४६॥ धर्म, अधर्म और एक जोव के असंख्यात प्रदेश होते हैं । आकाश के जितने प्रदेश में एक पुद्गल परमाणु रह सकता है, उतने आकाशदेश को प्रदेश कहते हैं । असं. ख्यात के तीन भेद हैं- जघन्य, उत्कृष्ट और अजधन्योत्कृष्ट । इनमें से यहां अजघन्योस्कृष्ट लिया गया है । धर्म और अधर्म द्रव्य पूरे लोकाकाश में व्याप्त हैं। एक जीव लोकाकाश प्रमाण प्रदेश वाला होने पर भी प्रदेशों में संकोच और विस्तार की अपेक्षा स्वकर्मानुसार प्राप्त शरीर प्रमाण हो रहता है । लोक पुरण समुद्धात के समय जीव पूरे लोकाकाश में व्याप्त हो जाता है। जिस समय जीव लोक पूरण समुद्धात करता है, उस समय मेरु के नीचे चित्र वज्र पटल के मध्य में जीव के पाठ मध्य प्रदेश रहते हैं और शेष प्रदेश पूरे लोकाकाश में व्याप्त हो जाते हैं। दण्ड, कपाट, प्रतर और लोक पुरण की अपेक्षा चार सभय प्रदेशों के विस्तार में और चारं समय संकोच में इस प्रकार लोक पूरण समुद्धात करने में आठ समय लगते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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