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अध्याय: छठai ]
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आगे मन्दराचल के समान देदीप्यमान मन्दर नाम के स्तूप हैं जिन पर चारों दिशा में भगवान की प्रतिमाएँ सुशोभित हैं, उनके आगे कल्पवासियों की रचना से युक्त कल्पवास नामक स्तूप हैं जो देखने वालों को कल्पवासी देवों की विभूति साक्षात् दिखाते हैं ।
उनके आगे ग्रैवेयकों के समान आकार वाले ग्रैवेयक स्तूप हैं जो मनुष्यों को मानो ग्रैवेयकों की शोभा ही दिखाते रहते हैं । उनके आगे अनुदिश नाम के नौ स्तूप सुशोभित हैं, जिनमें प्राणी नौ अनुदिशों को प्रत्यक्ष देखते हैं, आगे चलकर जो चारों दिशाओं में विजय आदि विमानों से सुशोभित हैं, ऐसे समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले सर्वार्थ सिद्धि नाम के स्तूप हैं । बन के आगे स्फटिक के समान निर्मल सिद्ध स्तूप प्रकाशमान हैं, जिनमें सिद्धों के स्वरूप को प्रकट करने वाली दर्पणों की छाया दिखाई देती है ।
उनके आगे दैदीप्यमान शिखरों से युक्त भव्यकूट नाम के स्तूप रहते हैं, जिन्हें भव्य जीव नहीं देख पाते क्योंकि उनके प्रभाव से उनके नेत्र अन्धे हो जाते हैं । उनके आगे प्रमोह नाम के स्तुप हैं, जिन्हें देखकर लोग अत्यधिक भ्रम में पड़ जाते हैं और चिरकाल से अभ्यस्त गृहीत वस्तु को भी भूल जाते हैं। आगे चलकर प्रबोध नाम के अन्य स्तूप हैं, जिन्हें देखकर लोग प्रबोध को प्राप्त हो जाते हैं और तत्त्व को प्राप्त कर साधु हो निश्चिन्त हो संसार से छूट जाते हैं ।
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इस प्रकार जिनकी वेदिकाएं एक दूसरे से सटी हुई हैं। तथा जो तोरणों से समुद्भासित हैं, ऐसे अत्यन्त ऊँचे दश स्तूप क्रम क्रम से परिधि तक सुशोभित हैं । इसके यागे एक कोट रहता है जो एक कोस चौड़ा तथा एक धनुष ऊँचा होता है और उसकी मण्डल की भूमि को बचा कर मनुष्य तथा देव प्रदक्षिणा देते रहते हैं । इस परिधि में बाहर की ओर सत्रह कणिकाएँ हैं जो एक-एक कोस विस्तृत हैं और भीतर की ओर एक करिका है जो साढ़े तीन योजन विस्तार वाली है ।
जिस प्रकार परिवेश सूर्य को घेरता है, उसी प्रकार चित्र-विचित्र रत्नों से निर्मित यह परिधि भीतर के देदीप्यमान मण्डल को घेरे रहती हैं । यहाँ गणधर देव की इच्छा करते ही एक दिव्य पुर बन जाता है, सो ठीक ही है, क्योंकि मन:पर्ययज्ञान के धारक जीवों का प्रभाव महान् होता है, वह पुर कल्व के ज्ञाता मनुष्य के द्वारा त्रिलोकसार, श्रीकान्त, श्रीप्रभु, शिवमन्दिर, त्रिलोकी श्री, लोक कान्ति श्री, श्रीपुर,