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[ गो. प्र. चिन्तामणि त्रिदशप्रिय, लोकालोक प्रकाशाद्यौ, उदय, अभ्युदया वह क्षेम, क्षेमपुर, पुण्य, पुण्याह, पुष्पकास्पद भुवःस्वः तप:सत्य, लोका-लोकोत्तम, रुचि रुचावह उदारद्धि, दान-धर्म पुर श्रेय श्रेयस्कर तीर्थ तीर्थावह उदग्रह, विशाल, चित्रकूट, धीश्रीधर, त्रिविष्टप, मंगलपुर, उत्तमपुर, कल्याणपुर, शरणपुर, जयपुरी, अपराजितपुरी आदित्यपुरी, जयन्तीपुरी, अचलसंपुर, विजयन्त, विमल विमलप्रभ, काम, गगनाभोग, कल्याण, कलिनाशन, पवित्र, पंचकल्याण, पद्यावर्त, प्रमोदय, पराय मण्डितावास, महेन्द्र महिमालय, स्वायम्भुव, सुधाधात्री, शुद्धावास, सुखावती, विरजा, वीतशोका, अर्थविमला, विनयावति, भूतधात्री, पुराकल्प, पुराण, पुण्यसंचय, ऋषिवती, यमवती, रत्नवती, अजरामरा, प्रतिष्ठा, ब्रह्मनिष्ठो:, केतुमालिनी, अरिन्दम, मनोरम, तमःपार, परली, रत्नसंचय, अयोध्या, अमृतधानी, ब्रह्मपुर, जाताह्य य और उदस्तार्थ नाम से कहा जाता है।
. भगवान के प्रभाव से उत्पन्न वह नगर तीन लोक के समस्त श्रेष्ठ पदार्थों के समूह से युक्त आश्चर्य स्वरूप एवं बहुत भारी आश्चर्य उत्पन्न करता हुअा सुशोभित होता है, उसका बनाने वाला कुबेर भो एकाग्रचित्त हो, उसके बनाने का पुनः विचार करे तो वह भी नियम से भूल कर जायगा, फिर अन्य मनुष्य की बात ही क्या है ?
- उस नगर का निर्माण यथास्थान छब्बीस प्रकार के सुवर्ग और मणियों से चित्र विचित्र है, अतः अत्यधिक सुशोभित होता है । उसके तल भाग में तीन जगती रहती है जो आधा-आधा कोस चौड़ी होती है और ऊपर-ऊपर उन जगतियों में उतनी ही हानि होती जाती है । उन जगतियों की रचना बज्रमयी एवं चित्रविचित्र रत्नों से उज्ज्वल है और उनकी श्रेष्ठ कान्ति चारों ओर इन्द्र धनुषों को विस्तृत करती रहती है छाती प्रमाण ऊँचे तथा देदीप्यमान प्रभा के धारक बरण्डे उन जगतियों को सुशोभित करते रहते हैं, तथा उन पर एक धनुष के अन्तर से स्थित सुशोभित पताकाएं हैं ।
उन जगतियों में तीस-तीस वितस्तियों के कुट और उनसे द्विगुरा अायाम वाले दश दश धनुषों के अन्तर से स्थित कोष्टक रहते हैं । उन जगतियों के समीप दोनों प्रोर द्वारपालों के दो-दो आवास स्थान हैं, जिनमें प्रत्येक द्वार पर कुवेर की अपूर्व धनराशि प्रकाशमान है । प्रत्येक जगती के कूटों की संख्या सात सौ बहत्तर है तथा कोष्टकों की संख्या अड़तालीस है ।
संक्षेप से तीनों जगतियों की कूट संख्या बाईस सी बीस है और कोप्टों की