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________________ अध्याय: छठवां ] [ ४७५ संख्या उसी प्रमाण से है । प्रथम जगती में बसीस हजार तीन सौ इक्यासी, दूसरी में चौबीस हजार दो सौ उन्नीस और तीसरी में इकतीस हजार छप्पन ध्वजाऐं रहती है। पूर्व कूटों में दो लाख बत्तीस हजार चार सौ सत्तर, मध्यम कूटों में सात लाख इकसठ हजार एक सौ और अन्तिम कूटों में दो लाख चौवन हजार आठ सौ अस्सी और कोष्टों में दुनी दुनी है । इस प्रकार समस्त स्वजनों की संख्या छब्बीस लाख बीस हजार दो सौ छप्पन है । वहां सस्वेद - जलसिक्त प्रदेशों में रत्नों से मण्डित अनेक मण्डप हैं जो दो कोस चौड़े और एक कोस ऊँचे हैं, जिनकी रचना मण्डपों से साधी चौड़ी है । ऐसे शिखरों के मध्य भाग में विराजमान जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमाएं हैं जो उत्तम मंगल द्रव्यों से सुशोभित हैं । यद्यपि ये प्रतिमाऐं अपने-अपने स्थान पर स्थित हैं, तथापि सामने खड़े होकर देखने वाले को ऐसी दिखाई देती हैं, मानो उन स्थानों से निकलकर आकाश में ही विद्यमान हो । वहां चारों दिशाओं में देदीप्यमान तीन पीठ होते हैं. उनमें पहले पीठ पर चार हजार धर्म चक्र सुशोभित हैं। दूसरी पीठ पर मथुर और हंस श्वजाओं से भिन्न थाठ प्रकार की महाध्वजाएँ दिशाओं को सुशोभित करती हुई विद्यमान है। तीसरी पीठ पर श्री मण्डप को सुशोभित करने वाला अनेक मंगलद्रव्यों से सहित गंधकुटी नाम का प्रसाद है, उनमें भगवान का सिंहासन रहता है । उस सिंहासन पर विराजमान जिनेन्द्रदेव की सन्तुष्ट चित्त के धारक मनुष्य, सुर और असुरों के झुण्ड के झुण्ड मुकुटों पर हाथ लगाकर स्तुति करते थे, वे कह रहे थे कि हे महादेव ! आपकी जय हो । हे महेश्वर ! श्राप जयवन्त हों, हे महाबाहो ! आप विजयी हों, हे विशाल नेत्र ! आप जयवन्त हो । मुनिसमूह को यदि लेकर बारह गरण भगवान श्रहन्त को प्रणाम कर यथास्थान उनकी उपासना करने को स्थित हो गये । मार्ग के चारों ओर घेर कर बारह सभाएँ उनकी पूर्व, दक्षिण आदि दिशाओं में मुनि समूह को आदि लेकर बारह गए विराजमान थे । वहां उत्कृष्ट वर को प्रदान करने वाले भगवान श्रर्हन्त के आगे गणधर को आदि लेकर अनेक मुनि सुशोभित थे, जो धर्म के स्वरूप को प्रत्यक्ष करने वाले एवं उदयन्त निर्मल धमेश्वर के ग्रंश के समान जान पड़ते थे ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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