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[गो. प्र. चिन्तामणि सुशोभित होते हैं जो ऐसा जान पड़ता है मानो भगवान् का विजय लक्ष्मी का मूर्ति धारी शरीर ही हो उस इन्द्रध्वज में देदीप्यमान गोले लटकती हुई मोतियों की माला
और जगमगाते हुए मरिणयों से युक्त एक पताका लगी रहती है । वह पताका वायु से कम्पित होने के कारण घण्टियों के शब्दों से अत्यन्त रमणीय जान पड़ती है । ऊपर उठती हुई किरणों से युक्त रत्नों की माला से सुशोभित वह पताका जब आकाश में फहराती है तब ऐसी जान पड़ती है मानो समुद्र से लहर ही उठ रही हो । इन्द्रादिक देव उसे बड़े कौतुहल से देखते हैं।
. उसके आगे एक हजार खम्भों पर खड़ा हुमा महोदय नाम का मण्डप है, जिसमें मूतिमती श्रु तदेवता विद्यमान रहती है । उस श्रु तदेवता को दाहिने भाग में करके बहुश्रुत धारक अनेक धीर-वीर मुनियों से घिरे श्रुतकेवली कल्याणकारी श्रुत का व्याख्यान करते हैं । महोदय मण्डप से प्राधे विस्तार वाले चार परिवार मण्डप और हैं जिनमें कथा कहने वाले पुरुष आक्षेपिरणी आदि कथाएं कहते रहते हैं । इन मण्डपों के समीप में नाना प्रकार के फुटकर स्थान भी बने रहते हैं जिनमें बैठकर केवलज्ञान आदि महाऋद्धियों के धारक ऋषि इच्छुकजनों के लिए उनकी इष्ट वस्तुओं का निरूपण करते हैं।
उसके आगे नाना प्रकार की लताओं से व्याप्त एक स्वर्णमय पीठ रहता है, जिसकी भव्य जीव नाना प्रकार की समयानुसार पूजा करते हैं। उस पीठ का श्रीपद नाम का द्वार है जो रत्नों और फूलों के समूह से युक्त है तथा जो मार्ग के बीच में बने हुए सूर्य और चन्द्रमा के समान देदीप्यमान मण्डलों से परिपूर्ण है । उस मार्ग के सम्मुख इच्छानुसार फल देने वाले निधियों के स्वामी दो देव सुशोभित रहते हैं ।
उनके आगे प्रमदा नाम की दो विशाल नाट्यशालाएं हैं जिनमें कल्पवासिनी अप्सरायें सदा नृत्य करती रहती हैं । विजयांगरण के कोनों में चार लोकस्तूप होते हैं, जिनपर पताकाओं की पवितयां फहराती रहती हैं, तथा जो एक योजन ऊंचे रहते हैं। ये लोकस्तुप नीचे वेत्रासन के समान मध्य में भालर के समान ऊपर मृदंग के समान
और अन्त में तालवृक्ष के समान लम्बी नालिका से सहित हैं, इनका स्वच्छ स्फटिक के समान रूप होता है अतः इनके भीतर की रचना अत्यन्त स्पष्ट रहती है इन स्तूपों में लोक की रचना दर्पणतल के समान स्पष्ट दिखाई देती हैं इन स्तूपों के आगे मध्य लोक नाम से प्रसिद्ध स्तूप है जिनके भीतर मध्यलोक की रचना स्पष्ट दिखलाती है ।
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