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________________ [ ४७ १ अध्याय : छठवां ] श्रेष्ठ गुणों का स्थान है तथा ऊंची उठने वाली किरणों से सुशोभित रत्नावली से अन्धकार के समूह को नष्ट करने वाला दूसरा पीठ है उसके आगे सिद्धार्थ वृक्ष हैं जो सिद्धों की प्रतिमाओं से सुशोभित शाखाओं से इच्छापूर्वक ही मानो दिशाओं को व्याप्त कर स्थित है । उसके आगे एक मन्दिर है जिसे पृथ्वी के ग्राभरणस्वरूप बारह स्तूप उस तरह सुशोभित करते रहते हैं जिस तरह कि स्वर्णमय चार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप के महामेरु को करते रहते हैं । इनके आगे चार दिशाओं में शुभ वापिकाएं हैं जो चारों दिशाओं में बने हुए गोपुर द्वारों और वेदिका से अलंकृत हैं नन्दा भद्रा जया और पूर्णा ये चार उनके नाम हैं उन वापिकाओं के जल में स्नान करने वाले जीव अपना पूर्व भव जान जाते हैं ये वापिकायें पवित्र जल से भरी एवं समस्त पापरूपी रोगों को हरने वाली हैं। इनमें देखने वाले जीवों को अपने आगे पीछे के सात भव दिखने लगते हैं वापिकाओं के आगे एक जयांग सुशोभित है जो एक कोस ऊंचा है एक योजन से कुछ अधिक चौड़ा है कटि बराबर ऊंचे बरण्डों पर स्थित कदली ध्वजाश्रों से व्याप्त है, जिसमें मनुष्य निरन्तर प्रवेश करते और निकलते रहते हैं । ऐसे द्वारों और उच्च तोरणों से युक्त है तीन लोक की विजय का आधार है उसमें बीच-बीच में मूगाओं की लाल-लाल बालुका अन्तर देकर मोतियों की सफेद बालू बिछी है ग्रामरत्नमय पुष्पों और रखे हुए स्वर्ण कमलों से चित्र विचित्र है उस जागरण के भू-भाव जहां-जहां स्वर्ण रससे लिप्त अतएव पृथ्वी पर आये हुए सूर्यो के समान दिखने वाले विशाल वर्तुलाकार मण्डलों से सुशोभित हैं । जहां-तहां नाना प्रकार के चित्रों से चित्रित वह जयगण देव असुर और मनुष्यों से परिपूर्ण भवनों मण्डपों तथा अन्य सुखकर निवास स्थानों से सुशोभित है । कहीं चित्रों से सुन्दर और कहीं पुराणों में प्रतिपादित आश्चर्यकारी विभूति से युक्त तथा नाना प्रकार के कथानकों से सहित भवन बने हैं, वे भवन कहीं पुष्य के फलकी प्राप्ति से देखने वाले लोगों को धर्म का साक्षात् फल दिखलाते हैं, तो कहीं पाप का परिपाक दिखाकर अधर्म का साक्षात् कल दिखाते हैं । वे भवन उन दर्शकजनों को दानशील, तप और पूजा प्रारम्भ तथा उनके फल की एवं उनके अभाव में होने वाली विपत्तियों को श्रद्धा कराते हैं । उस जयांगण के मध्य में स्वर्णमय पीठ को अलंकृत करता हुआ इन्द्रध्वज
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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