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[ गो. प्र. चिन्तामणि
मात्र से युक्त दो-दो सिद्धार्थ वृक्षों से सहित कल्प वृक्षों का वन वीथियों के अन्त में यथारीति स्थित है । तदनन्तर चार गोपुरों सहित वन की रक्षा करने वाली विदिका है। और मार्गों में तोरणों युक्त सबका भला करने वाले नौ-नौ स्तुप हैं, वे स्तूप पद्मराग मणियों से निर्मित होते हैं तथा उनके समीप स्वर्ण और रत्नों के बने मुनियों और देवों के योग्य नाना प्रकार के सभागृह रहते हैं ।
सभागृहों के आगे आकाशस्फटिक मणि से बना नाना प्रकार के महारत्नों से निर्मित सात खण्ड वाले चार गोपुरों से सुशोभित तीसरा कोट है । इस कोट के पूर्व द्वार के विजय, विश्रुत, कीर्ति, विमल, उदय विश्वयुक् वासवीर्य और वट ये आठ नाम प्रसिद्ध हैं। दक्षिण द्वार के वैजयन्त, शिव, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, ग्रन्थ, धारण याम्य और अप्रतिघ ये आठ नाम कहे गये हैं, पश्चिम द्वार के जयन्त, अमित, सार, सुधाम, भक्षोम्य, सुप्रभ, वरुण और वरद ये आठ नाम स्मरणीय किये गये हैं । और उत्तर द्वार के अपराजित, ग्रर्थं अतुलार्थ, उदक, प्रमोधक, उदय, अक्षय और पूर्णकमल ये आठ नाम हैं, उन द्वारों के पसवाड़ों में उत्तम रत्नमय प्रासनों के मध्य में स्थित मंगलरूप दर्पण सुशोभित हैं जो देखने वालों के पूर्व भव दिखलाते हैं । ये दर्पण गाढ़ अन्धकार को नष्ट करने वाले कान्ति के समूह से सदा देदीप्यमान रहते हैं और उनसे गोपुर सूर्य की प्रभा को तिरस्कृत कर अतिशय शोभायमान होते हैं ।
और तीन
से
विजयादिक गोपुरों में यथायोग्य 'जय हो' 'कल्याण हो' इन शब्दों का उच्चारण करने वाले एवं देदीप्यमान आभूषणों से युक्त कल्पवासी देव द्वारपाल रहते हैं ये तीनों कोट एक कोस, दो कोस कोस ऊँचे होते हैं तथा मूल मध्य ऊपरी भाग में इनकी चौड़ाई ऊंचाई प्राधी होती हैं इन कोटों के जगतीतलों का प्रमाण अपनी ऊँचाई से तीन हाथ कम कहा गया है और उनके ऊपर बने हुए बन्दर के सिर के आकार के कंगूरे एक हाथ तथा एक वितस्ति चौड़े और आधा येमा ॐ कहे गये हैं । उसके आगे नाना वृक्षों और लतागृहों से व्याप्त मंच प्रेक्षागरि और प्रेक्षागृहों से सुशोभित अन्तवर्ण हैं । वेदिकाओं से बद्ध वीथियों के बीच में कल्याण जय नाम का गन है और उसमें शाल्मली वृक्ष के समान ऊंचे एवं अन्तर से स्थित केला के वृक्ष प्रकाशमान हो रहे हैं ।
तदनन्तर उन्हीं के भीतर नाट्यशाला है जिसमें स्वर्ण के समान कान्ति की धारक लोकपाल देवों की देवांगनाएं निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, उनके मध्य में