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________________ अध्याय : छठवां ] [ ४६६ तीन खण्ड को स्वर्णमयी देदीप्यमान बत्तीस नाट्यशालाएं हैं, ये नाट्यशालाएं डेढ़ कोस चौड़ी हैं, नाना प्रकार के बेल बुटों से सुशोभित हैं और उनकी मूर्तियां रत्नों की बनी हैं तथा उनकी दीवालें स्वच्छ स्फटिक से निर्मित हैं, उनमें ज्योतिषी देवों की ३२-३२ देवांगनाएं नृत्य करती हैं जो हाव-भाव और विलास से युक्त तथा शृगार प्रादि रसों की पुष्टि से सुपुष्ट होती हैं । उसके पामे चार गोपुरों से युक्त अत्यन्त सुन्दर ब्रजमयी वनदेवी है, जो पूर्वोक्त वनों को चारों ओर से घेरे हुए है ।। . चार गोपुरों के आगे चार विथियां हैं और उनके दोनों पसवाड़ों में ध्वजाओं की पंक्तियां फहराती रहती हैं प्रत्येक विभाग में उन ध्वजाओं की पृथक्पृथक् पीठिकायें हैं, जो तीन धनुष चौड़ी हैं, चित्र विचित्र हैं तथा उनपर आधा योजन अंने रत्नमाणी लांस लगे हुए हैं उन बांसों के अग्नभाग पर जो पटियां लगी हैं उनमें दशों प्रकार की रंग-बिरंगी छोटी-छोटी घण्टियों और जिस पट्टकों से युक्त बड़ी ध्वजाएं फहराती रहती हैं । वे दश प्रकार की ध्वजाएं फहराती रहती हैं वे दश प्रकार की ध्वजाएं क्रम से मयूर, हंस, गरुण, भाला, सिंह, हाथी, मकर, कमल, बैल और चक्र के चिन्ह से चिन्हित होती हैं एक दिशा में एक जाति की ध्वजाएं एक सौ पाठ होती हैं और चारों दिशात्रों की मिलकर एक जाति की चार सौ बत्तीस होती हैं, यह इनकी सामान्यरूप से संक्षेप में संख्या बतलायी है । विशेष रीति से एक दिशा में एक करोड़ सोलह लाख चौसठ हजार है और चारों दिशाओं में चार करोड़ अड़सठ लाख छत्तीस हजार कुछ अधिक है। प्रीति और कल्याण रूप फल देने वाली बपिकानों के बीच के मार्ग में दोनों ओर पांच खण्ड की नृत्यशालाएं हैं, जिनमें भवनवासी देवों की देवांगनाएं नृत्य करती हैं नृत्यशालानों के आगे पांच-पांच स्खण्ड के रत्नमयी चार गोपुरों से विभूषित स्वर्ग निर्मित दूसरा कोट है। गोपुरों के दोनों पसवाड़ों में देदीप्यान स्वर्ण के पीठों पर स्थित शंख के समान सुन्दर कण्ठों में पड़ी मालानों से सुशोभित्त मुखों पर कमल धारण करने वाले एवं जल से भरे स्वर्ण निर्मित मंगलकलश दो-दो की संख्या में सुशोभित हैं इस दूसरे कोट द्वारों पर भवनवासी देवों के इन्द्र द्वारपाल हैं जो बेत की छड़ी धारण किए हुए पहरा देते हैं, गोपुरों के आगे दो-दो नाट्यशालाएं हैं और उसके आगे स्वर्ण निर्मित दो-दो धूपघट रखे हुए हैं उससे आगे चारों दिशाओं में सिद्धों की प्रति
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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