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________________ ४६८ } [ गो. प्र. चिन्तामणि फूलों के द्वारा दिशात्रों के अन्त भाग को सुगन्धित कर रहा है तथा पक्षियों और भ्रमरों के समूह से व्याप्त है, उसके आगे देदीप्यामान स्वर्ण के समान चमकीला एवं विजय आदि चांदी के बड़े-बड़े चार गोपुरों से सुशोभत कोट चारों ओर से घेरे हुए हैं जो उन गोपुरों पर व्यन्तर जाति के देव द्वारपाल है, जो कटल आदि आभूषणों से मोभित हैं, पाने पभान मे अयोग्य व्यक्तियों को दूर हटाते रहते हैं तथा जिनके हाथ मुद्गरों से उद्धत होते हैं, देदीप्यमान कान्ति से युक्त उन गोपुरों के मणिमय तोरणों की दोनों ओर छत्र चभर तथा भृगार प्रादि अष्टमङ्गल द्रव्य एक सौ पाठ-एक सौं आठ संख्या में सदा सुशोभित रहते हैं । उन गोपुरों के प्रागे वीथियों की दोनों ओर तीन-तीन खण्ड की दो-दो नाट्यशालाएं हैं, जिनमें बत्तीस-बत्तीस देव कन्यायें नृत्य करती हैं। तदनन्तर पूर्व दिशा में अशोक वन दक्षिण में सप्तपूर्ण वन पश्चिम में चम्पक वन और उत्तर में आम्र बन सुशोभित है, इन चारों वनों में अशोक वन का अशोक वृक्ष सप्तपर्ण वन का सप्तपर्ण वृक्ष चम्पक वन का चम्पक वृक्ष और पान बन का आम्र वृक्ष स्वामी है । ये स्वामी वृक्ष सिद्ध की प्रतिमानों से सहित है अर्थात उनके नीचे सिद्धों की प्रतिमाएं विराजमान रहती हैं, उन वनों में तिकोनी चौकोनी और गोलाकार अनेक वापिकानों के तट रल्ल निर्मित हैं, तथा उनकी भूमि स्फटिक से निर्मित हैं, ये सभी वापिकायें तोरणों युक्त हैं, दर्शनीय हैं, सीढ़ियों से युक्त हैं, ऊंचेऊँचे बरण्डों से सुशोभित हैं प्रवेश करने में गहरी हैं और दो कोस चौड़ी हैं नन्दा नन्दोतरा आनन्दा नन्दवती अभिनन्दिनी और नन्दघोषा ये छह वापिकायें अशोक दन में स्थित है । विजया अभिविजया जैसी वैजयन्ती अपराजित जयोत्तरा में छह वापिकाएं सप्तपर्ण वन में स्थित है, कुमुदा, नलिनी, पद्मा, पुष्करा विश्वोत्पला और कमला में छह वापियां चम्पक वन में मानी गई हैं और प्रभासा, भास्वती, भासा, सुप्रभा भानुमालिनी और स्वयंप्रभा में छह वापियां आम्रवन में कही गई हैं, पूर्ण आदि दिशाओं की वापिकायें क्रम से उदय, विजय, घाती और ख्याति नामक फल देती हैं तथा इन फलों के इच्छुक मनुष्य इन वापिकाओं की पूजा करते हैं। क्रम के जानने वाले भक्तजन उन वापिकाओं से यथोक्त फूलों का समूह प्राप्त कर स्तुपों तक क्रम क्रम से जिनेन्द्र प्रतिमाओं की पूजा करते हुए आगे प्रवेश करते हैं उदय और प्रातिरूप फल को देने वाली वापिकाओं के बीच के आगे के दोनों ओर
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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