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अध्याय : छठा
[ ४६७ आकर इन्हें नमस्कार करते हैं । जहाँ स्थित होकर मनुष्य और देव मानस्तम्भों की पूजा करते हैं । वह आस्थानांगणा नाम की भूमि देदीप्यमान लाल मणियों की कान्ति को धारण करती हैं। विधियों के मध्य में तीन कटनीदार चार सुवर्णमयी पीठिकायें हैं छाती बराबर ऊँची हैं और प्राधा कोस चौड़ी हैं।
उन पाठिकाओं पर चार मानस्तम्भ सुशोभित हैं, जो पाठिकाओं की चौड़ाई से एक धनुष कम चौड़े हैं और एक योजन से कुछ अधिक चौड़े हैं और एक योजन से कुछ अधिक ऊँचे हैं, वे मानस्तम्भ बारह योजन की दूरी से दिखाई देते हैं, पालिका के अग्रभाग पर जो कमल हैं, उन्ही पर स्थित हैं, उनका मूलभाग होरा का मध्यभाग स्फटिक का है और अग्ल भाग वैडूर्य मलि का बना हुआ है । हर एक मानस्तम्भ दो-दो हजार कोगों से सहित है, दो दो हजार पहल के हैं, नाना रत्नों की किरणों से मिले हुए हैं. उसकी चारों दिशाओं में लाल सिहों की प्रतिमाएं विराजमान हैं तथा उनकी रत्नमयी बड़ी बड़ी पालिकायें हैं। पालिकाओं के अग्रभाग पर जो कमल हैं, उन पर स्वर्ण के देदीप्यमान घट हैं ।
उन घटों के अग्रभाग से लगी हुई सीढ़ियां हैं तथा उन सीढ़ियों पर लक्ष्मी देवी के अभिषेक की शोभा दिखलायी गयी है, वे मानस्तम्भ लक्ष्मीदेवी के धूडारल के समान अपनी कांति के समह से बीस योजन तक का क्षेत्र प्रकाशमान करते हैं तथा जिनका मन अहंकार से युक्त है ऐसे देव और मनुष्यों को वही रोक देने वाले हैं उन मानस्तम्भों की चारों दिशायें हंस, सारस और चकवों के शब्दों से अत्यन्त सुन्दर है तया उनमें खिले हुए कमलों से युक्त चार सरोवर हैं।
सरोवर के आगे एक बज्रमय कोट है, जो छाती बराबर ऊंचा है, अत्यन्त कान्ति से युक्त है । ऊँचाई से दूना चौड़ा है और चारों ओर से घेरे हुए है । इस कोट को चारों ओर से घेरकर एक परिवा स्थित है, जिसकी भूमि जल के समान कान्ति वाले मागियों से निर्मित है।
। उसमें घुटनों प्रमाण गहरा पानी भरा है तथा वह पृथ्वी रूपी स्त्री की नीली साड़ी के समान जान पड़ती है । वह परिखा अत्यन्त स्वच्छ है तथा उसका जल स्वर्णमय कमलों की पराग के समुह से पीला-पीला हो रहा है, अतएव उसमें प्रतिबिम्बित दिशा रूप स्त्रियों के मुख अंगराग से सहित समान जान पड़ते हैं ।
उसके आगे चारों ओर से घेरकर स्थित लताओं का बन सुशोभित है जो