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[ गो. प्र चिन्तामणि की प्रवृत्ति जारी रहने से सयोग कहा जाता है। दोनों विशेषताओं को लेकर इसका सयोग केवल नाम प्रचलित है । इस गुणस्थान में जीव को अन्तरंग और बहिरंग लक्ष्मी प्रकट हो जाती है और अन्त कहलाने लगता है । केवलज्ञान उत्पन्न होते ही समवशरण की रचना देवों द्वारा की जाती है ।
अगर सामान्य केवली है तो उनको गंव कुटि की रचना होती है और तीर्थंकर केवली है तो, उनके शरीर की जैसी अवगाहना होती है उसी श्रवगाहना के अनुसार समवसरण की रचना होती है ।
समवशरण का वर्णन
प्रश्न :- अर्हन्त प्रभु का समवशरण कैसा होता है ?
उत्तर:- समवशरण की दिव्य भूमि स्वाभाविक भूमि से एक हाथ ऊँची रहती है और उससे एक हाथ ऊपर कल्पभूमि होती है । यह भूमि अपनी शोभा से स्वर्गे लक्ष्मी को जीतने वालो, चौकोर सुखदायी और देशकाल के अनुसार बारह योजन से लेकर एक योजन तक विस्तार वाली होती है ।
भावार्थ -- समवशरण भूमि का उत्कृष्ट विस्तार बारह योजन और कम से कम विस्तार एक योजन प्रमाण होता है । यह भूमि कमल के श्राकार की होती है। इसमें गंधकुटी तो कणिका के समान ऊँची उठीं होती है और बाह्य भूमि कमल दल के समान विस्तृत है । यह इन्द्र नीलमणि से निर्मित होती है, इसका बाह्य भाग दर्पण तल के समान निर्मल होता है और प्रवेश करने वाले बहुत से जीवों को एक साथ स्थान देने वाली रहती है । जिसमें मान के योग्य इन्द्र श्रादि देव त्रिलोकीनाथ भगवान की दूर से ही पूजा करते हैं वह मानांगण नाम की भूमि है ।
इस भूमि की चारों महादिशाओं में दो-दो को विस्तृत महाविथियां हैं। से विधियां अपने मध्य में स्थित चार मानस्तम्भों के पीठ धारण करती हैं । ये पीठ अपनी ऊँचाई से तिगुने चौड़े एवं स्वर्ण और रत्नमधी मूर्तियों के धारक होते हैं तथा मनुष्य, सुर, असुर सभी आकर इन्हें नमस्कार करते हैं । जहाँ स्थित होकर मनुष्य और देवमानस्तम्भों की पूजा करते हैं वह ग्रास्थानांगणा नाम की भूमि देदीप्यमान लाल मरियों की कान्ति को धारण करती है। ये पीठ अपनी ऊँचाई से तिगुने चौड़े एवं सुवर्ण और रत्नमयी मूर्तियों के धारक होते हैं तथा मनुष्य, सुर, ग्रसुर सभी