________________
-=awinner-100------
अध्याय : छठा ]
[ ४६५ प्रश्न :- सूक्ष्मसापराय गुस्सस्थान का क्या स्वरूप है ?
उसर :-- जहां केवल संज्वलन लोभ का सूक्ष्म उदय रह जाता है, उसे सूक्ष्मसाम्पराय कहते हैं। अष्टम मुरास्थान से उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी ये दो श्रेणियां प्रकट होती हैं। जो चारित्र मोह का उपशम करने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे उपशम श्रेणी में प्रारूढ़ होते हैं और जो चारित्र मोह का क्षय करने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे क्षपक श्रेणी में आरूढ़ होते हैं। परिणामों की स्थिति के अनुसार उपशम या क्षपक श्रेणी में यह जीव स्वयं प्रारूढ़ हो जाता है, बुद्धिपूर्वक प्रारूढ़ नहीं होता है। क्षात शेती पर शाया मष्टि ही गारद हो सकता है, पर उपशम श्रेणी पर ग्रौपशभिक और क्षायिक दोनों सम्यग्दृष्टि आरूढ़ हो सकते हैं । यहाँ विशेषता इतनी है कि जो औपशमिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणी पर आरूढ़ होगा, वह श्रेणी पर आरूढ़ होने के पूर्व अनन्तानुबन्धी को विसंयोजना कर उसे सत्ता से दूर कर द्वितीयोपशमिक सम्यग्दृष्टि हो जावेगा । जो उपशम श्रेणी पर प्रारूढ़ होता है, वह सूक्ष्म साम्पराय मुखस्थान के अन्त तक चारित्र मोह का उपशम कर चुकता है और क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होता है, वह चारित्र मोह का क्षय कर चुकता है।
प्रश्न :-उपशान्त मोह गुरगस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--उपशम श्रेणी वाला जीव दशवें गुरवस्थान में चारित्र मोह का पूर्ण उपशम कर ग्यारहवें उपशान्त मोह गुरणस्थान में आता है। इसका मोहपूर्ण रूप से शान्त हो चुकता है और शरद ऋतु के सरोवर के समान इसकी सुन्दरता होती है। अन्तर्मुहूर्त तक इस गुणस्थान में ठहरने के बाद यह जीव नियम से नीचे गिर जाता है।
प्रश्न :---- क्षोरण मोह गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-क्षपक श्रेणी बाला जीव दसवें गुणस्थान में चारित्र मोह का पूर्ण धायकर बारहवें क्षीरगमोह गुरणस्थान में प्राता है यहां इसका मोह बिल्कुल ही क्षीण हो चुकता है और स्फटिक के भाजन में रखे हुए स्वच्छ जल के समान इसकी स्वच्छता होती है।
प्रश्न :--सयोग केवली मुणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-बारहवें गुणस्थान के अन्त में शुक्लध्यान के द्वितीय पाद के प्रभाव . से ज्ञानाबरणादि कर्मों का युगपत् क्षयकर जीव तेरहवें गुरणस्थान में प्रवेश करता है। यहां इसे केवलज्ञान प्रकट हो जाता है, इसलिये केवली . कहलाता है और योगों