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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि समझना. यह त्रैलोक्यपूज्य ब्रह्मचर्य है। स्त्रियों के फोटो, भीत पर लिखे हुए स्त्रियों के . आकार चित्र, मिट्टी, पाषाण इत्यादिक से . बने हुए स्त्रीचित्र अर्थात् मनुष्य, देवांगना और तिर्यचिणी इनके प्रतिबिंब देखकर इनके ऊपर कामुक नहीं होना यह ब्रह्मचर्य है। . ब्रह्मचर्य का संरक्षगा करने के लिये स्त्रीकथा का त्याग करना चाहिये तथा उनमें माता, सुता और बहिन का संकल्प रखना चाहिये । अर्थात् स्त्रियों का कोमल भाषण,. मृदु स्पर्श, रूपावलोकन, नृत्य, गीत, हास्य, कटाक्ष निरीक्षण प्रेम से तिरछा देखना इत्यादिकों में अभिलाषा नहीं रखना यह त्रैलोक्य पूज्य ब्रह्मचर्य महावृत है । इस प्रत के नी, इक्यासी और एक सौ वासठ भेद होते हैं ।। प्रश्न :---परिग्रह त्याग महाव्रत का क्या स्वरूप है ? ... उत्तर :-जीवरिणबद्धा बद्धा परिग्गाहा जीव संभवा चेव । ... ... ..... तेसि सबकच्चागो इयरह्मि य रिगमोऽसंगो ॥११।।१४६॥ बद्ध-जीव में उत्पन्न होने वाले अपति जीव के प्रायन ले रहने वाले विकार जैसे - मिथ्यात्व, वेद-स्त्री, पुरुष और नपुसक इनको भोगने की अभिलापा, हास्य . रति, अरति, शोक, भय, जुासा, क्रोध, मान, माया, लोभ से अन्तरंग चौदह परिग्रह । हैं, ये जीवाश्रित हैं। दासी, · दास, गाय, घोड़ा वगैरह को भी चेतन परिग्रह कहते हैं। . . . .. आबद्ध :-- अनाश्रित. जीन से पृथक रहने वाले परिग्रह जैसे खेत, घर, धनं, ' धान्य वगैरह । इनका संग्रह करने की अभिलापा उत्पन्न होती है, इसलिये ये भी. परिग्रह हैं । जीव संभव-जीवों से जिनकी उत्पत्ति होती है, ऐसे पदार्थों को जीब्रोद्भव “परिग्रह कहते हैं, जैसे—मोती, शंख, सीप, चर्म, दाँल, कंवल वगैरह । तथा मुनिपना. के अयोग्य ऐसे क्रोधादिक । इन सब परिग्रहों का शक्ति से त्याग करना चाहिये । अर्थात् इनके ऊपर अभिलाषा रखना ही नहीं । इनका मन, वचन और शरीर से.. सर्वथा त्याग करना चाहिये । इस · संयम, ज्ञान और शौच के उपकरणभूत पिछी... । शास्त्र. कमंडलु इत्यादि में ममत्व रहित होना चाहिये । इस संयमोपकरगादिक में अतिमूर्छा नहीं रखना चाहिये । यह पांचवा परिग्रह त्याग-महानत है। प्रश्न :- पांच समितिओं के भेद और लक्षण क्या है ? .. उत्तर :-इरिया भासा एसरण शिक्खेवादारणमेव संमिदीश्री। पदिठावशिया य तहा उच्चारादोरण पंचविहा ॥१२॥१४७॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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