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________________ अध्याय : पांचवां । [ १६३ . .पांच महायत, पांच समितियां पांच ही इन्द्रियों के निरोध, छह आवश्यक, लोय, आचेलक्य, अस्नान, पृथिवीशमन, अदंतधर्षण, स्थिति भोजन, एक भक्त ये मुनिगरगों के अट्ठाईस भूलगुण हैं ।। प्रश्न :-~-प्रथम पांच महावतों के नाम क्या हैं ? उत्तर :--हिंसा का स्याग, सत्य, चोरी का त्याग, ब्रह्मचर्य और परिरह का त्याग - ये पांच महाव्रत कहे गये हैं। प्रश्न :--अहिंसा महावत का क्या लक्षण है ? उत्तर :-कार्योदयगुण मग्गण कुलाउजोरगीसु सधजीवारणां। गाऊरण य ठाणादिसु हिंसादि विवज्जरण महिसा ॥५॥१४२।। काय, इन्द्रिय, गुणस्थान, मार्गरगास्थान, कुल, आयु, योनि---इनमें सब जीवों को जानकर कायोत्स fदि क्रियानों में हिसा आदि का त्याग उसे अहिंसा महानत कहते हैं। प्रश्न :--- सत्य महावत का क्या स्वरूप है ? - उत्तर :- रागादीहि असच्चं चत्ता परताव सच्चबयरपोत्ति। . . सुत्तत्थाणवि कहरणे अयधावयणुभरणं सच्चं ॥६॥१४३॥ रागद्वेषमोह आदि कारणों से असत्य वचन को तथा दूसरे को संताप करने बाले एसे सत्य बचन को छोड़ना और द्वादशांग शास्त्र के अर्थ. कहने में अपेक्षा रहित वचन छोड़ना यह सत्य महायत है । प्रश्न :--प्रचौर्य महावत का क्या लक्षण है ? उत्तर :-गांमादिसु पडिदाइंसपप्पदि परेण संगहि । . रणादाणं परदव्वं अदत्त परिवज्जरणं तं तु ॥७॥१४४॥ ग्राम ग्रादिक में पड़ा हुआ, भूला हुग्रा, रक्खा हुआ इत्यादि रूप अल्प भी स्थल सूक्ष्म वस्तु तथा दूसरे का बड़ा किया हुया ऐसे पर द्रव्य का ग्रहण नहीं करना (नहीं लेना) बह अदत्त त्याग अर्थान् अचौर्य महावृत है । प्रश्न :-ब्रह्मचर्य महानत. का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---मादुसुदा भगिणी विय दट्ट रिपस्थित्तियं च पडिरूवं । '. इथिकहादिणियत्ती तिलोय पुज्ज हवे बं ।।।।१४५।। माता, पुत्री और वहिन के समान बूढ़ी, वालिका और तरुण स्त्रियों को . . : . . क्या लक्षण है ? भारी
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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