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________________ [गी. प्र. चिन्तामरिण १६२ ] जनक प्रमाद युक्त परिणाम को प्रमत्त विरत गुणस्थान कहते हैं । यद्यपि संज्वलन और नो कपाय का उदय चारित्र गुरण का विरोधी है.. तथापि वह प्रत्याख्यानावरण कषाय का उपशम होने से प्रादूर्भूत सकल संयम के. घातने में समर्थ नहीं है । इस कार उपचारका कहा है । इसलिये. इस गुगास्थान वर्ती मुनि को प्रमत्तविरत प्रर्थात् चित्रलाचरण कहते हैं । * सकल चारित्र * प्रश्न :- प्रपत्तविरत तपोधन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---- -विषयाशावशातोतो. निरारम्भोऽपरिग्रहः । ज्ञानध्यानतपो रत्नस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥१॥१३६॥ जो विषयों की प्राणा के बम से रहित हो, प्रारम्भ रहित हो; परिग्रह रहित: हो और ज्ञान, ध्यान, तथा तप रूपी रत्नों से सहित हो, यह गुरू प्रशंसनीय है । स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय भूल माला तथा स्त्री यादि विषयों की प्राकांक्षा सम्बन्धी प्रधीनता जिनकी नष्ट हो गई है, अर्थात् जिन्होंने इन्द्रिय विषयों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, जो खेती आदि व्यापार का परित्याग कर चुके हैं । जो बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से रहित हैं तथा ज्ञान, ध्यान और तप को ही जो रत्नों के समान श्रेष्ठ समझ कर उन्हीं की प्राप्ति में लीन रहते हैं, ग्रट्ठाईस मूल गुणों को धारण करते हैं, ऐसे ही सद्गुरु मुनि तपस्वी होते हैं । येही सच्चे मुनियों का लक्षण है । प्रश्न - मूलगुण किसे कहते हैं ? उत्तर :- मुनियों के प्रधान आचरण को मूलगुण कहते हैं । इन मूलगुणों का पालन करने से उत्तर गुण धारण करने की शक्ति प्राती है । मूल शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, तो भी यहां मूल प्रधान, मुख्य ऐसा अर्थ समझना चाहिए, गुण शब्द के भी अनेक ग्रंथ हैं, परन्तु यहां श्राचररण विशेष समझना चाहिये । प्रश्न : ---मुनियों के मूलगुण कितने होते हैं ? और उनका क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :- पंचय महन्वयाई समिविप्रो पंच जि वरोछिट्टा । श्रावासया पंचेविदिपरोहाछपिय प्रचंचेलक महारां खिदिसयरणमदंत घस्सरणं चेव । fofe भीयय भत्तं मूलगुणा श्रट्टवीसा || ३ || १४१ ।। मूलाचार अ. १ लोचों ||२|| १४० ॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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