SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 243
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ . अध्याय : पांचवां ] १६१ ऐसे छह प्रकार के प्रारम्भ हैं । प्रायिका ऐसे कार्यों को न करे । प्रश्न :----भिक्षा के लिये वे किस प्रकार से गमन करती है ? . उत्तर :--तिणिव पंच व सत्त व अज्जाम्रो अण्णमण्यारक्खाओ। . . . . . धेरोहिं संहतरिदा .. भिक्खाय समोदरति सदा ।।१३६।। तीन किंवा पांच अथवा सात गायिकाएँ परस्पर में रक्षण करने का अभिप्राय मन में धारण करती हुई बद प्रायिकानों के पीछे-पीले अनुगमन करती हुई, भोजन के लिये इपिथ समितिपूर्वक विहार करती हैं। यहाँ 'भिक्षा ग्रहण करना' यह कार्य उपलक्षण रूप समझना चाहिये । जैसे कौवे से दही का रक्षरण करो, अर्थात् कौबे, चूहे वगैरह प्राणियों से दही, दूध वगैरह का रक्षरण करो ऐसा अर्थ माना जाता है । वैसे - भिक्षा के समान देव वंदना वगैरह कार्य के लिये जाने के समय में भी उपर्युक्त पद्धति से ही ग्रायिकाओं की प्रवृत्ति होथे । ऐसा अभिप्राय: प्राचार्य ने प्रकट किया है। .. प्रश्न :-प्राचार्यादिकों की वंदना मुनियों के समान ही करती है क्या ? उत्तर:-पंच दद सत्स हत्थे सूरी अभावगो य साधू य । ... परिहरिराज्जानो गवासणेगव वंदति ॥१३७॥ . आचार्य को प्रायिकायें पांच हाथ दूर से, उपाध्याय को छह हाथ दूर से तथा साधु को सात हाथ दूर से गवासना से ही बैठकर वंदना करती है । जिस प्रकार से गी बैठती है, उसी प्रकार से बैठना उसको गवासन कहते हैं । पालोचना, अध्ययन, स्तुति इनकी अपेक्षा से भेद समझना चाहिये । जैसे—ग्रालोचना करते समय आचार्य से पांच हाथ दूर रहकर आयिका पालोचना करे । छह हाथ दूर रहकर उपाध्याय से अध्ययन करे तथा साधु से मात हाथ दूर रहकर उनकी स्तुति करे । ___ एवं विधाण चरियं चरति जे साधवो य अज्जायो । ते जगपुज्ज वित्ति सुहं च लदूरण सिझति ।।१३।। इस प्रकार अर्थात् इस अध्याय में जो समाचार का सविस्तर वर्णन किया है: .. उसके अनुसार जो साधु और नायिकायें प्रवृत्ति करती हैं 1 वे जगत के द्वारा सम्मान, . कीति और सुख प्राप्त करती हैं और अन्त में मुक्त होती हैं। . ... [ मूलाचार अध्याय ४ पृष्ट सं. १०० ] ... प्रश्न :-छठे प्रमत्तचिरत नामक गुणस्थान का क्या स्वरूप है ? ...... उत्तर :--सञ्चलन और नो कपाय के तीन उदय से समय भाव तथा मल ". HERE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy