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अध्याय : पांचवां |
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ईर्यासमिति, भाषासमिति एषणासमिति श्रादानविक्षेपण समिति और प्रतिष्ठापना समिति --- इस प्रकार समिति के पांच भेद हैं ।
विशेषार्थ :
समिति--प्राना, जाना, बैटना वगैरह क्रिया करना अर्थात् अच्छी तरह से देखकर तथा मन को स्थिर कर गमनागमन क्रिया करना ।
भाषासमिति :: बोलने की सम्यक् प्रवृत्ति करना अर्थात् श्रागम व धर्म से ग्रविरुद्ध तथा पूर्वापर संबंध को न छोड़कर निष्ठुरता, कर्कश, मर्मछेदक वगैरह दोषों से रहित ऐसा भाषा बोलना । एपणासमिति---लोकनिद्य तथा सुतकादि दोष सहित ऐसे कुलों को छोड़कर शुद्ध कुल के गृहस्थों के घर में आहार ग्रहण करना । . निक्षेपादान समिति-ग्राँखों से देखकर व पिंथि सेता कर यत्नपूर्वक वस्तु को रखना और ग्रहगा करना | प्रतिष्ठापना समिति-जन्तुरहित प्रदेश में अच्छा निरीक्षण कर मलमूत्रादिकों का त्याग करना । इस प्रकार से पांच समितियां हैं ।
प्रश्न :-- ईयसमिति का विशेष स्पष्टीकरण क्या है ?
उत्तर :- पासुयममरण दिवा जुगन्त रथे हिरणा सक्कज्जेण ।
जंतूरण परिहरतेगिरियासमिदी हवे गमनं ।। १३ । ११४८ ।।
जिसमें से जीब चले गये हैं अर्थात् निर्जन्तुक मार्ग से सूर्योदय होने पर चार दस्त प्रमाण जमीन देखकर एकाग्रचित करके शास्त्र श्रवण, तीर्थयात्रा, गुरुवंदना इत्यादि धर्म कार्य के लिए एकेंद्रियादि- प्राणियों का रक्षण करते हुए जो मुनिराज गमन करते हैं। उसको ईर्यासमिति कहते हैं । विशेष—- हाथी, घोड़ा, गाय महिष गैरह प्रति हमेशा जाने से जो मार्ग निर्जन्तुक हो गया है, ऐसे मार्ग से ही धर्म कार्य के लिए गमन करते हैं । सूर्योदय होने के अनंतर ग्रांखों में पदार्थ देखने की सामर्थ्य व्यक्त हो जाती है तब चार हाथ तक श्रागे की भूमि निहारते हुये और एकेंद्रियादिक प्राणियों का रक्षण करते हुए मुति गमन करते हैं । ऐसे थागमोदत नमन को ईसमिति कहते हैं ।
प्रश्न :- भाषा समिति का स्वरूप क्या है ?
उत्तर :- सुहास क्कसपरणिवा पप्पल विहादी ।
'वज्जिता सपरहियं भासा समिदी वे कहणं ।। १४ । १४६ ।। वैशून्य --- निर्दोष व्यक्ति के ऊपर दोषारोपण करना, हास- हास्यकर्म के उदय में धर्म की हंसी उड़ाकर हर्ष मानना, कर्कश कर कठोर काम युद्ध कलह प्रवर्तक वचन