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[ गो. प्र. चिन्तामणि
बोलता, परनिंदा - दूसरों के सच्चे व झूठे दोष प्रकट करना अथवा दूसरों के गुण : नहीं सहना, या प्रशंसा - स्वतः के गुण प्रगट करने का अभिप्राय रखना, विकथादि स्त्री कथा, भोजन कथा, चोर कथा और राजकथा वगैरह रागद्वेषोत्पादक कथा कहना । ये भाषा के सर्व दोष छोड़कर अपना व अन्य का जिससे कल्याण होगा ऐसा.. कर्म बंध के कारणों से रहित वचन बोलना वह भाषासमिति है 1
प्रश्न :- एषणा समिति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-छादाल दोस सुद्ध कारणजुत्तं विसुद्धणक्कोडी |
सोदादी समभुत्ता परिसुद्धा एसरणां समिदी ।। १५ ।। १५० ।। मुनि जो ग्राहार लेते हैं, वह उद्गमादि दियालीस दोषों से रहित निर्दोष होता है | ( उद्गम दोष के सोलह भेद हैं। उत्पादन दोष भी सोलह प्रकार का है । एपगा दोष के दस भेद हैं | तथा गंगारादिदोष के चार भेद हैं। इनका वर्णन पिड शुद्धि अधिकार में करेंगे ।) असातावेदनीय कर्म का उदय होने से उत्पन्न हुई क्षुधा को मिटाने के लिए और वैयावृत्यादि करने के लिये मुनि श्राहार लेते हैं । बल और आयुष्य वृद्धिगत होने की इच्छा से वे बाहार नहीं लेते हैं । दाता स्वतः के लिए जो निर्दोष आहार बनाता है, वही मुनि लेते हैं । मुनि मन, वचन, शरीर कृत, कारित और अनुमोदन इन नौ भेदों से रहित ग्राहार लेते हैं । ग्राहार बनाने के लिए मुनि श्रावकों को वचनादि से प्रेरणा नहीं करते हैं । वे नव कोटियों से निर्दोष ग्राहार लेते. हैं। शीत, उष्ण, लवणं, रुक्ष, स्निग्ध वगैरह ग्राहारों में वे रागद्वेष रहित रहते हैं ! इस प्रकार का आहार लेने वाले मुनिराज की यह निर्दोष एवासमिति है ।
प्रश्न :- प्रादान निक्षेपण समिति का क्या स्वरूप है ?. उत्तर :- णाणु वह संजसुबह सउचुर्वाह
मध्यमुह वा ।
पयद गहणिक्खेवो समिदी आदाणणिक्खेवा ।।१६।। १५१ ।। ज्ञानोपवि श्रुतज्ञान के उपकरण शास्त्र, संयमोपवि-हिंसादि पापक्रियाओं का त्यागरूप जो संयम उसका संरक्षरण करने के कारण अर्थात् प्राणिदया के निमित्त ऐसे पिटिकादिसंयमोपधि हैं। शोचोपधि-- मलमूत्रादि मल हरण के उपकरण कमंडलु श्रादि पदार्थ । इन पदार्थों का उपयोग प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये । प्रथति ये पदार्थ लेते समय और रखते समय जीवदया का ख्याल रखकर लेने की व रखने की प्रवृत्ति करे तथा उपर्युक्त पदार्थ से भिन्न ऐसे बटाई, फलक, तृरण वगैरह पदार्थ लेते या