________________
Mantra
अध्याय : पांचवां ]
T
रखते समय प्रयत्नपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए। इस प्रकार की प्रवृत्ति को प्रादान . . निक्षेपण समिति कहते हैं। .
प्रश्न :-- प्रतिष्ठापनिका समिति का स्वरूप क्या है ? . उत्तर :- एगते प्रश्चित्ते दूर गूढे विसालमविरोहे। . . . .
. उच्चारादिच्चाप्रो पदिठावरिणया हवे समिदी ॥१७॥१५२॥
एकान्त-जहाँ असंयमी जनों का आना जाना नहीं ऐसा प्रदेश; अच्चित्तोहरितकाय बनस्पति और हींद्रियादिक' जीव रहित प्रदेश, जले हुए के समान दिखने बाला प्रदेश; दूरे-ग्राम नगरादिक से दूर ऐसा प्रदेश । अर्थात् ऊपर कहे हुए विशेषणों से
युक्त स्थान में यत्न पूर्वक मल मूत्रादि का त्याग करने के लिए मुनि जाते हैं । उनकी : यह प्रतिष्ठापनिका समिति हैं । . . ... ..........
प्रश्न :- समिति बंध का कारण क्यों नहीं है ? उत्तर :-जियदु व मरदु व जीवो अयदाचारस्थ रिणच्छिदा हिंसा ।
पक्दस्स खत्थिः बंधो हिसामेत्तेण सभिदस्स ॥१८॥१५३।। जो प्रमाद युक्त होकर पाना, जाना, उठना, बैठना इत्यादि क्रिया करता है उसको जीव-प्राणी जीये या मरे हिंसा का दोष अवश्य लगता है । वह हिसक समझना चाहिये । परन्तु जो गमनागमन क्रिया प्रमाद रहित होकर समिति पूर्वक करता है उसको जीव हिसा होने पर भी पाप कर्म का बंध नहीं होता है.।।
प्रश्न :-इन्द्रिय निरोध व्रत का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-चक्खू सोदं घारणं जिभा फासं च इंदिया पंच ।
सग सग बिसए हितो रिणरोहियन्वा समा मुरिगणा ॥१६॥१५४।। प्रांख, कान, नाक, जीभ और स्पर्शन ऐसी पांच इंद्रियां हैं। इन इंद्रियों से . क्रम से पांच प्रकार का रूप, कर्कश, कोमल वगैरह शब्द; सुगंध और दुर्गध, पाँच प्रकार के मधुरादि रस और गीत, ऊरण वगैरह पाठ प्रकार के स्पर्श जाने जाते हैं। अपने-अपने विषयों में प्रवृत्ति करके ये . इंद्रियां प्रात्मा को रागी, द्वेधी, मोही बनाती हैं। अतः इन मनोहर और अमनोहर विषयों से संयमप्रिय मुनिराज इंद्रियों को परावृत करते हैं । ये मुनिराज के पांच मूलगुण हैं । . प्रश्न :-चक्ष निरोध मलंगण का क्या स्वरूप है ?
..
.
पया स्वरूप है ?