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[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :--सचित्ताचित्ताणं किरियासंठाणवण्या भेएसु ।
रागादि संग हरणं चक्खु रिसरोहो हो मुखिरगो ॥२०॥१५॥ सचित्ताचित्तारणं-ज्ञान दर्शनोपयोगात्मक चैतन्य जिनमें हैं. ऐसे पदार्थ अर्थात् देव मनुष्यादि स्त्रियों के रूप, सचित्त द्रव्य रूप पदार्थ हैं। जिनमें चैतन्य नहीं है, ऐसे सचित्त द्रव्य के प्रतिबिंब को अचित्त द्रव्य रूप कहते हैं। तथा अचित्तद्रव्यः-- अजीव द्रव्य घटपटादि द्रव्य को भी अचित्तद्रव्य कहते हैं। इन वेतन अचेतन पदार्थों के क्रिया, संस्थान-ग्राकृति और वर्ग के भेदों में पारा गौर गाभिलाषा नहीं रखना
यह मुनिराज का चक्षुनिरोध - अर्थात् नेद्रिय को वश रखना इस नाम का मूल. गुण है।
. विशेषार्थ :... स्त्रियों को क्रिया-गीत, विलास, नत्य, तिरछा अवलोकन और :.. इधर उधर सथिलास आना जाना । संस्थान उनके देह की सुन्दर आकृति अथवा एक
हाथ कटी पर रखकर एक हाथ पोष्ट पर रखना इत्यादि. आकर्षक खड़े रहने के प्रकारों को संस्थान कहते हैं । वर्ग स्त्रियों के शरीर का प्रयामादिक रंग। ये सब इष्टानिष्ट प्रकार देखकर जो राग, द्वेष, अभिलाष उत्पन्न होते हैं, उनका निराकरना करना यह चक्षुनिरोध नामक मूलगुराग है। स्त्री पुरुषों के अचेतन प्रतिबिम्ब को क्रियादिक देखकर उसमें भी रागद्वेष वश न होना, अभिलाष रहित होना यह भी चक्षुनिरोध नामक मुलगुरण है ।
प्रश्न :-कर्ण निरोध मूलगुण का क्या स्वरूप है ? उत्तर :----सङ्गादिजीव सह वाणादि अजीव संभवे सहे।
... रागादीव णिमित्ते तदकरणं सोदरोधो दु॥२०॥१५६॥
पड्ज, ऋषभ, गांधार वगैरह सात स्वर के ध्वनि सुनने से तथा बीगा और गया बगैरह के चेतन अचेतन, प्रिय अप्रिय . शब्द सुनने से हृदय में रागद्वेषादि विकार उत्पन्न होते हैं । अतः उपयुक्त स्वर शब्द को स्वतः : सुनने की अभिलाघा मुनिराज मन में उत्पन्न नहीं होने देव । स्वतः पड़जादि स्वर से गायन नहीं करें। यदि अन्यजन पजादि स्वरोच्चार करने लगे तो रागादिभाव से वे स्वर नहीं सुने । इस प्रकार की प्रवृत्ति रखना यह करणं निरोध नामक मूलगुण है । .. प्रश्न :-प्रारणेन्द्रिय निरोध व्रत का स्वरूप क्या है ?
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