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________________ श्रध्याय: पांचवां ] उत्तर :- पयडोवासरखगंधे जीवाजीवरयगे सुहे हे ! [ १६६ घाणगिरोहो मुणिवरस्स ॥२१॥ १५७॥ रागादोसा कर कुछ पदार्थों में स्वभावतः अच्छा और बुरा गंव रहता है और कुछ पदार्थों मैं अन्य पदार्थ के संयोग से अच्छा और बुरा गंध उत्पन्न होता है। अच्छा गंध सुख उप करता है और आप उम्पन्न होता है। बुरा गन्ध दुःखद होता है और उसमें द्वेष होता है, कस्तूरी गोरोचन वगैरह सुगंधि-वस्तु हरिण, गाय वगैरह प्राणियों में उत्पन्न होती है, अतः इनको जीवात्मक गंध कहते हैं और चंदन गंधादिक श्रचेतनात्मक गंव है। इनमें रागद्वे पादिक नहीं करना यह मुनीश्वर का प्रागनिरोध नामक मूलगुण है | प्रश्न :- रसनेन्द्रिय निरोध का स्वरूप क्या है ? इट्ठाकाहारे उत्तर :- प्रसरणादिचदुत्रियपध्ये पंचर से फासुगन्हि खिजे । दत्ते जिन्भाजोऽगिद्धी ।। २२ ।। १५८।। जीव रहित - सम्मूर्छनादि जीव रहित अर्थात् प्रासु प्रहार मुनि लेते हैं । जो प्रहार स्वयं सचित्त है अथवा जिससे सम्मू छनादिक उत्पन्न हो रहे हैं ऐसा आहार ● मुनियों के लिए ग्राह्य नहीं होता । जिस आहार के लेने से पापात्र होता है । तथा लोक में निंदा होती है, वह प्रहार मुनि नहीं लेते हैं । श्राहार के प्रशन, पान, खाद्य और स्वाद्य ऐसे चार भेद हैं । भात, रोटी, पूरी वगैरह प्रशन हैं। दूध, खीर, खड़ी पेयाहार है । लाडू, पेडा वगैरह खाद्याहार है, और इलायची, लवंग वगैरह स्वाद्य है । तीखा, कडुवा, कसायला, अम्ल और मधुर ऐसे लवंग रस का मधुर रस में ग्रन्तर्भाव होता है । कोई ग्रहार मनोहर होता है और कोई प्रिय होता है । उपर्युक्त विशेषणों से संहित श्राहार दांता के द्वारा दिये जाने पर उसमें मुनि गृद्धि नहीं रखते हैं । मधुरादिक. प्रिय प्राहार मुझको हमेशा मिले. और कटु आहार कभी भी नहीं मिले ऐसी इच्छा अर्थात् राग द्वेष भाव मुनि मन में नहीं रखते हैं । यह उनका रसनेन्द्रिय निरोध नामक मूलगुण है !. पांच रस उस श्राहार में रहते हैं । प्रश्न : --- स्पर्शनेन्द्रिय निरोध का लक्षण स्वरूप क्या है ? उत्तर :--- - जीवा जोवा समुत्थे कक्कसमउगादि प्रभेदजुदे 1 फासे हेय हे फालएि रोहो मोहो ।।२३।। १५६ ।। चेतन और वेतन पदार्थों से उत्पन्न हुए कठोर, मृदु, स्निग्ध-निकता, रुक्ष, प्रभातपत्रपत्रिका .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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