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[ गो. प्र. चिन्तामणि हलका, भारी, ठंडा और उष्ण ऐसे साठ भेद जिसके आधार भत हैं. ऐसे स्पर्श में मुनि गण आनंद और खेद नहीं मानते हैं । यह उनका स्पर्शनिरोध नामक मूल गरम है ।
* छह प्रावश्यक * समदा थयो य बंदरण पडिक्कमरणं तहेव यादव्वं ।
पच्चरखारण विसगो करगीया बासया छप्पि ।।२४।।१६०॥ .
समता-राग द्वेष मोह वगैरह भावों से रहित होना अथवा . त्रिकाल पंच ..
.. समता-संयो ...नमस्कार करना इसको सामयिक भी कहते हैं । स्तव-ऋषभादि चौवीस तीर्थंकरों की .. . स्तुति । वंदना-एक तीर्थकर का दर्शन और वंदन करना अथवा पंच गुरु भक्ति पर्यन्त :
दर्शन वंदना करना । प्रतिक्रमण - जिसके द्वारा मुनि पूर्व संयम के प्रति गमन करते हैं। यह क्रिया प्रतिक्रभरण नाम की है । प्रत अशुनच भर परीर के द्वारा जो प्रवृत्ति हुई थी, उससे परावृत्त होना, अशुभ क्रिया नहीं करना यह प्रतिक्रमना है। किये हुए अपराधों का शोधन करना यह प्रतिक्रमण है। इसके देवसिक, रात्रिक ऐपिथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, वार्षिक व उत्तमाथिक ऐसे सात भेद हैं। प्रत्याख्यान अयोग्य द्रव्य का त्याग करना किंवा योग्य द्रव्य का त्याग करना । विसर्ग-देह के। ऊपर ममत्व रहित होकर जिनगुण चिन्तन युक्त कायोत्सर्ग करना । ऐसे छह आवश्यक हैं । इन्द्रिय, कषाय, नो कपाय, रागद्वेषादिक के वश जो नहीं होता है, वह अवश है। ऐसे अवश मुनि का ज़ों कर्त्तव्य उसको प्रावश्यक कहते हैं। .. . समता का स्वरूप.---. ..
जीविदमरण लाहालाहे संजोगविष्प जोगेय । बंधुरि सुहदुक्खादिसु समदा सामायियं णाम..।।२५।।१६१॥
जीवित-औदारिक वैक्रियिकादि देह धारण करना, मरण-मृत्यु, प्राणी का प्रारणों से वियोग होना । लाभ--इच्छित वस्तु की प्राप्ति । अलाभ-उसकी अप्राप्ति । अर्थात् आहारादिक की प्राप्ति होने पर अथवा इष्ट वियोग में शत्रु, सुख, दुःख, भूख प्यास, शीत, उष्ण वगैरह में समता रखना यह सामयिक है। जीवित मरण वगैरह । में जो समान परिणाम- रागद्वेप रहित भाव होना वह सामायिक है । त्रिकाल देव वंदना करना यह भो सामयिक प्रत है।