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अध्याय : पांचयां ]
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सामायिक
समतासर्वभूतेषु संयमे . शुभ भावना । प्रातरौद्र परित्यागः तद्धि सामायिक मतम् ।।१६२॥
प्राध्यिान और रोद्रव्यान. का त्याग कर, संयम में शुभ भावना रखते हुवे मर्व जीवों पर समता धारर्ग करना सामायिक है। .. ध्यान
'एकाग्न चिन्ता निरोधो ध्यानम्' एकाग्रता से चित का निरोध करना ही ध्यान है। किसी पदार्थ में ही चित का ..एका हो जाना व्यान है।
प्रश्न :- ध्यान कितने प्रकार का है ?
उत्तर :-~-ध्यान के मूलभेद चार हैं-प्रात, रौद्र, धर्म और शुक्ल । ध्यान के : उत्तरभेद सोलह हैं। .. .. यार्तध्यान के चार भेद-इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, पीडाचितन, और निदान ।
रौद्र ध्यान के चार भेद हैं । हिंसानन्दी, मृघानन्दी, चौर्यानन्दी परिग्रहानन्दी, . - धर्म ध्यान चार प्रकार का है—अाज्ञा विचय, अपाय विचय, विपाक विचय, और संस्थान विचय । .
शुक्ल ध्यान के चार भेद हैं—पृथकत्ववितक, एकत्ववितर्क, सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति, व्युपरतक्रिया निवर्तनी। .
इन ध्यानों में चार आर्त ध्यान और चार रौद्रध्यान ये जीव को नरक तियच . में ले जाने वाले हैं, इसलिये अशुभ हैं । इन आतं ध्यान और रौद्रध्यान को छोड़कर जो योगी धर्म ध्यान और शुक्लध्यात को ध्याता है । उसकी सच्ची सामायिक होती है । धर्म ध्यान से जीव स्वर्ग जाता है, पुण्य बंध का कारण हैं। और छंटे गुणस्थान में जीव को ही होता है । शुक्ल ध्यान सातवें गुरास्थान से शुरू होता है।
यहां अब धर्म ध्यान का विशेष वर्णन करते हैं क्योंकि प्रमत मुनि इसी ... ध्यान का सहारा लेकर अपने सामायिक में स्थित रहता है । . सामायिक में स्थित योगी किस प्रकार धर्म ध्यान का चितवन करते हैं और ध्यान में क्या चितवन करते हैं, सो कहते हैं । यति होकर ध्यान से कैसे च्युत हो जाता है।
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