SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 301
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ HOMom ..अध्याय : पांचवां ] .. [ २४६ संस्थान विचय धर्मध्यान के अन्तर्गत प्रथम पिण्डस्थ ध्यान का वर्णन--. पिण्डस्थं च पदस्थ सहपस्थं गाजित चतुर्घा ध्यानमाम्नातं भव्यराजीव भास्करैः ।।४१६॥ . . जो भव्य रूपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए मूर्य के समान योगीश्वर हैं, उन्होंने ध्यान को पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ऐसे चार प्रकार का कहा है। पिण्डस्थं पञ्च विज्ञेया धारणा बीरणिताः। संयमी यास्व संमूढो जन्म पाशानिकृन्तति ॥४२०॥ . पिण्डस्थ ध्यान में श्री वर्द्धमान स्वामी ने कहीं हुई जो पांच धारणाएं हैं, . उसमें संयमी मुनि ज्ञानी होकर संसार रूपी पाश को काटता है। पाथिवी स्यात्तथाग्नेयो श्वसना वाथ वारुणी । तत्व रूपवती चेति विज्ञेयास्तां यथाक्रमम् ॥४२१॥ वे धारणायें पार्थिवी, आग्नेयी तथा श्वसना, बारुणी और तत्व रूपवती ऐसे . यथाक्रम से होती है। पाथिवीधारणा का स्वरूप । तिर्यग्लोक समें योगी स्मरति क्षीरसागरम् । नि.शब्दं शान्त कल्लोले हारनीहार संनिभम् ॥४२२॥ . प्रथम ही योगी मध्यलोक में स्वयंभरमरण नामा समुद्रपर्यन्त जो तिर्यक लोक है, उसके समान नि:शब्द, कल्लोल रहित तथा हार और बरफ के सदृश सफेद क्षीर समुद्र का ध्यान (चिन्तवन) करे 1 ... . . तस्य मध्ये सुनिर्माणं सहस्त्र दल मम्बुजम् । स्मरत्यमित मादीप्तं इत. हेम . समप्रभम् ॥४२३॥ उस क्षीर समुद्र के मध्य भाग में सुन्दर है निमारग (रचना) जिसकी और अमित फैलती हुई दीप्ति से शोभायमान, पिघलाये हुए सुवर्ण की सौ प्रभा वाले एक सहस्रदल के कमल का चिन्तवन (ध्यान) करें। .. . (चित्र नं. १) अब्जराग समुद्भुत केसरालि विराजितम् । जम्बूद्वीप प्रमारणं च चित्तभ्रमर रञ्चकम् ।।४२४॥ फिर इस कमल को कैसा ध्यावे कि कमल के रोग से उत्पन्न हुई केसरों की .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy