SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 300
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ . . ११५।। २४८ ] [ गो. प्र. चिन्तामगि के नाश करने वाले सिद्ध भगवानों का प्राश्रय स्थान है। चिदानन्दगुणोपेता - निष्ठितार्था विबन्धनाः । यत्र सन्ति स्वयं बुद्धाः सिद्धाः सिद्धः स्वयंवराः ॥४१५।। उस मोक्ष स्थान में सिद्ध भगवान विद्यमान हैं, वे चैतन्य और प्रानन्द कहिये गुग्गों में संयुक्त हैं, कृत-कृत्य है, कर्म बन्ध से रहित है, स्वयं बुद्ध हैं, अर्थात् जिनके स्वाधीन अतीन्द्रिय ज्ञान है. तथा सिद्ध (मुक्ति) को स्वयं वरने वाले हैं। समस्तोऽयमहो लोकः । केवलज्ञान गोचरः । तं व्यस्त वा समस्तं वा स्वशक्तया चिन्तयेद्यतिः ।।४१६॥ अहो भव्य जीवों! यह समस्त लोक कपल शान गोवा । तथापि इस संस्थान विचय नामा धर्म ध्यान में मुनि सामान्यता से सबको ही तथा व्यस्त कहिये कुछ भिन्न-भिन्न को अपनी शक्ति के अनुसार चिन्तवन करें। विलीना रोष कर्माण स्फुरन्तमति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्ग गर्भगतं स्मरेत ।।४१७॥ तथा इस. लोक के संस्थान के . चिन्तवन के पश्चात अपने शरीर में प्राप्त धुरुषाकार अपने प्रात्मा को कर्म रहित स्फरायमान अति निर्मल चिन्तवन (स्मरण) । MARAT '. इति निगदितमुच्चैर्लोक संस्थानमित्थं, नियत मनियतं वा ध्यायतः शुद्धबुद्धः । .. भवति सतत योगाद्योगिनो निष्प्रभादं, नियतमति दूरं केवल ज्ञान राज्यम् ॥४१८।। ग्राचार्य महाराज कहते हैं कि इस पूर्वोक्त प्रकार से कहे हुए लोक के स्वरूप : (संस्थान) को इस प्रकार नियत मर्यादा सहित वा अनियत मर्यादा रहित चिन्तवन करता हना जो निर्मल बुद्धि मुनि है उसको प्रमाद रहित ध्यान करने से नियम से शीघ्र ही केवल ज्ञान राज्य की प्राप्ति होती है। भावार्थ-अप्रमत नामा सातवें गुणस्थान में यह धर्मध्यान उत्कृष्ट होता है, उस गुणस्थान से फिर क्षपक श्रेशी का प्रारम्भ करने पर अन्तमुहर्त में केवल ज्ञान की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार संस्थान विचय नाम धर्मध्यान में लोक संस्थान का चितवन करना होता है, इस कारण लोक के संस्थानों का वर्णन किया; यदि किसी को लोग का विशेष वर्णन देखना हो तो त्रिलोकसारादि ग्रन्थों से देखे । . . .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy