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अध्याय : पांचवा ]
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अशेष विषयोद्भूतं दिव्यस्त्री संगसंभवम् ।
विनीत जन विज्ञान ज्ञानार्थ स्वयंलाञ्छितम् ॥ ४०६ ॥
स्वर्ग का सुख समस्त प्रकार के विषयों से उत्पन्न हुआ है तथा दिव्य स्त्रियों के संगम से उत्पन्न हुआ है तथा विज्ञान चतुराई ज्ञानादिक ऐश्वर्यं सहित उत्पन्न हुग्रा है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ?
सौधर्माद्यच्युतान्ता ये कल्पाः षोडशबणिताः ।
heeratarस्ततो ज्ञेया देवा वैमानिकाः परे ॥ ४१० ॥ प्रवीचारविर्वाजिताः ।
अहमिन्द्राभिधानास्ते
विद्धि शुभेच्यांना. शुक्ललेश्यावलम्बिनः ॥ ४११ ॥
सौधर्म स्वर्ग से लगाकर अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह स्वर्ग कल्प कहे जाते हैं, उनसे ऊपर जो व चैत्रेयकों में वैमानिक देव हैं, वे कल्पातीत कहलाते हैं ।
देवमिन्द्र नाम से वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका श्राचार्यों ने अहमिन्द्र नाम कहा है ये ग्रहमिन्द्र काम रहित हैं उनके स्त्री का मैथुन नहीं है, इसी कारण वहां देवांगनायें नहीं होती; उन देवों का शुभ ध्यान उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ है और शुक्ल लेश्या के धरने वाले हैं ।
अनुत्तर विमानेषु श्री जयन्तादिपञ्चसु ।
संभूय गिरगरच्युत्वा व्रजन्ति पदम व्ययम् ॥। ४१२।।
तत्पश्चात् उन नव ग्रैवेयक विमानों से ऊपर श्री जयन्तादिक पाँच अनुत्तर विमान हैं। उनमें जो देव उत्पन्न होते हैं, वे वहाँ से गिरकर मनुष्य हो अवश्य ही मोक्ष को पाते हैं ।
कल्पेषु च विमानेषु परतः परतोऽधिकाः ।
शुभ श्यायुविज्ञान प्रभावः स्वगिणः स्वयम् ॥ ४१३।।
तथा कल्पों में और कल्पातीत विमानों में शुभ लेश्या आयु विज्ञान प्रभावादिक करके देव स्वयं ही अगले विमानों में अधिक-अधिक बढ़ते हुए हैं । ततोऽग्रे शाश्वतं धाम जन्मजातङ्क विच्युतम् !
ज्ञानिनां यदधिष्ठानं क्षीण निःशेष कर्मणाम् ||४१४ ||
उन अनुत्तर विमानों से आगे अर्थात् ऊपर शाश्वत धाम ( मोक्ष स्थान व सिद्ध शिला) है सो संसार से उत्पन्न हुए क्लेश दुःखादि से रहित है और समस्त कर्मों