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________________ । SNSIONS । २४६ ] गो. प्र. चिन्तामलिंग संकल्पानन्तरोत्पन्न दिव्य भोगः समन्वितम् । सेबमानाः सुरानीकैः श्रयन्ति वगिणः सुखम् ।।४०३॥ तथा संकल्प करते ही उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के दिव्य मनोहर भोगों को भोगते हुए देवों की सेना सहित वे स्वर्ग के सुख भोगते रहते हैं। महाप्रभाव सम्पन्न महाभूत्योपलक्षिले । । कालं गतं न जानन्ति निमन्ताः सौख्यसागरे ॥४०४।। इस प्रकार महाप्रभाव सहित महाविभूति युक्तं स्वर्गों के सुख रूपी समुद्र में निमग्न रहते हुये समय को नहीं जानते कि कितना बीत गया । कचिद्गीतः क्वचिस्तत्यः क्वचिद्वाध मनोरमैः। . क्वचिद्विलासिनी बात क्रीडा शङ्गार दर्शनैः ।।४०५॥ . . दशा भोगजे: सौख्यर्लभ्यमानाः पचित् क्वचित् । : वसन्ति स्वगिणः स्वर्ग कल्पनातीत वभवे ॥४०६॥ इस प्रकार कहीं तो मन को लुभाने वाले गीत तथा नृत्य बादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओं के समूह से. किये हा क्रीडा शृगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकार के भोगों (कल्प वृक्षों) से उत्पन्न हुए मुखा सहित कल्पनातीत विभव वाले स्वर्गों में वे देव रहते हैं। दशांग भोगों का स्वरूपमद्यतूर्य ग्रह ज्योति भूषा भाजन विग्रहाः। स्त्रग्दीप वस्त्र पात्रामा दशधा कल्प पादपाः ।।४०७॥ मद्य, वादित्र, गृह, ज्योति, भूषण, भोजन, माला, दीपक, वस्त्र, पात्र. इन दस प्रकार के भोगों के देने वाले दश प्रकार के कल्प वृक्ष. स्वर्गों में होते हैं। इस कारण स्वर्ग के देव देशांग भोग भोगते हैं । यत्सुखं नाकिनां स्वर्गे तद्वक्तु केम पार्यते । स्वभाव जमनात सर्वाक्ष प्रोणं नक्षमम् ॥४०॥ स्वर्गों में स्वर्ग वासियों को जो सुख है, उसका वर्णन करने में कोई समर्थ नहीं है। क्योंकि वह सुख बिना प्रयास के स्वयमेव उत्पन्न होता है, उस स्वर्ग में अातंक (रोगादिक) नहीं है और समस्त इन्द्रियों को तृप्त करने में समर्थ है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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